श्रीमद् भागवतम
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भागवत पुराण  »  स्कन्ध 5: सृष्टि की प्रेरणा  »  अध्याय 19: जम्बूद्वीप का वर्णन  »  श्लोक 14

 
श्लोक
यथैहिकामुष्मिककामलम्पट:
सुतेषु दारेषु धनेषु चिन्तयन् ।
शङ्केत विद्वान् कुकलेवरात्ययाद्
यस्तस्य यत्न: श्रम एव केवलम् ॥ १४ ॥
 
शब्दार्थ
यथा—जिस प्रकार; ऐहिक—इस जीवन में; अमुष्मिक—भावी जीवन में; काम-लम्पट:—कामवासनाओं में लिप्त रहने वाला पुरुष; सुतेषु—सन्तान; दारेषु—पत्नी; धनेषु—सम्पत्ति में; चिन्तयन्—सोचते हुए; शङ्केत—भयभीत रहता है; विद्वान्— आत्मज्ञानी पुरुष; कु-कलेवर—इस मलमूत्र से पूरित शरीर का; अत्ययात्—क्षति के कारण; य:—जो कोई; तस्य—उसका; यत्न:—प्रयास; श्रम:—समय एवं शक्ति का अपव्यय; एव—निश्चय ही; केवलम्—मात्र, केवल ।.
 
अनुवाद
 
 सामान्य रूप से भौतिकतावादी जन अपने वर्तमान तथा भावी शारीरिक सुखों में अत्यन्त लिप्त रहते हैं। अत: वे अपनी पत्नी, सन्तान तथा सम्पत्ति के विचारों में सदैव मग्न रहते हैं और इस मलमूत्र से भरे हुए शरीर को त्यागने से भयभीत रहते हैं। यदि कृष्णभक्ति में संलग्न व्यक्ति भी अपने शरीर-त्याग से भयभीत हों तो फिर शास्त्रों के अध्ययन में किये श्रम का क्या लाभ? यह केवल समय की बरबादी है।
 
तात्पर्य
 मृत्यु के समय भौतिकतावादी व्यक्ति अपनी पत्नी तथा सन्तान के विषय में सोचता रहता है। वह इसी सोच में डूबता-उतराता रहता है कि उसकी मृत्यु के बाद उनकी देखभाल कौन करेगा और वे कैसे रहेंगे। अत: वह कभी भी शरीर नहीं छोडऩा चाहता, वरन् वह जीवित रहकर अपने समाज, परिवार, मित्र इत्यादि की सेवा करते रहना चाहता है। अत: उसे चाहिए कि योगाभ्यास द्वारा ऐहिक सम्बन्धों से विरक्त हो जाये। यदि भक्तियोग की साधना तथा वैदिक साहित्य के अध्ययन के पश्चात् भी मनुष्य इस कुदेह का जो मन के कष्टों की जड़ है परित्याग करने
से भयभीत होता है, तो आध्यात्मिक जीवन में उन्नति का प्रयास करने से क्या लाभ? योग साधना का रहस्य शारीरिक लगाव से मुक्त होना है। श्रील नरोत्तदास ठाकुर का कथन है कि देह-स्मृति नाहि यार, संसार-बंधन काहाँ तार— जिसके अभ्यास से दैहिक चिन्ताओं से मुक्ति मिल जाती है उसे अधिक काल तक बद्ध जीवन नहीं बिताना पड़ता। ऐसे व्यक्ति का बन्धन से छुटकारा हो जाता है। कृष्णभावनामृत में लगे व्यक्ति को बिना किसी भौतिक आसक्ति के पूर्णरूपेण अपना भक्तिकार्य संपन्न करना चाहिए। तभी उसकी मुक्ति निश्चित है।
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All glories to saints and sages of the Supreme Lord
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥