श्रीमद् भागवतम
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भागवत पुराण  »  स्कन्ध 5: सृष्टि की प्रेरणा  »  अध्याय 19: जम्बूद्वीप का वर्णन  »  श्लोक 15

 
श्लोक
तन्न: प्रभो त्वं कुकलेवरार्पितां
त्वन्माययाहंममतामधोक्षज ।
भिन्द्याम येनाशु वयं सुदुर्भिदां
विधेहि योगं त्वयि न: स्वभावमिति ॥ १५ ॥
 
शब्दार्थ
तत्—अत:; न:—हमारी; प्रभो—हे प्रभो; त्वम्—आप (तुम); कु-कलेवर-अर्पिताम्—मलमूत्र से पूरित इस बुरे शरीर में लगे हुए; त्वत्-मायया—आपकी माया से; अहम्-ममताम्—“मैं और मेरा” का विचार; अधोक्षज—हे सत्त्व; भिन्द्याम—त्याग सकता है; येन—जिससे; आशु—शीघ्र ही; वयम्—हम; सुदुर्भिदाम्—जिसको त्याग पाना दुष्कर है; विधेहि—कृपया प्रदान करें; योगम्—क्रिया; त्वयि—आपको; न:—हमारा; स्वभावम्—जो स्थिर मन के द्वारा जाना जाता है; इति—इस प्रकार ।.
 
अनुवाद
 
 अत: हे प्रभो, हे अधोक्षज, कृपा करके हमें भक्तियोग साधने की शक्ति प्रदान करें जिससे हम अपने अस्थिर मन को वश में करके आप में लगा सकें। हम सभी आपकी माया से प्रभावित हैं, अत: हम मलमूत्र से पूरित शरीर तथा इससे सम्बन्धित प्रत्येक वस्तु के प्रति अत्यधिक समर्पित हैं। इस आसक्ति को त्यागने का एकमात्र उपाय भक्ति है, अत: आप हमें यह वर दें।
 
तात्पर्य
 भवद्गीता में श्रीकृष्ण का उपदेश है—मन्मना भव मद्भक्तो मद्याजी मां नमस्कुरु। सदैव श्रीकृष्ण का चिन्तन, भक्ति में व्यस्तता, सदैव श्रीकृष्ण की पूजा और उनको नमस्कार करना—ये पूर्ण योगक्रिया के अन्तर्गत आते हैं। इस योगक्रिया को किये बिना इस मल-मूत्र पूरित शरीर के प्रति मोह को त्याग पाना दुष्कर है। योग
की सिद्धि इसी में हैं कि देह के प्रति जो भी मोह है उसे श्रीकृष्ण के प्रति आसक्ति में परिणत कर दिया जाये। हम सांसारिक सुख में अत्यधिक लिप्त हैं, किन्तु जब हम श्रीकृष्ण के प्रति वैसी आसक्ति उत्पन्न कर लेते हैं, तो हमारे उद्धार का मार्ग प्रशस्त होता है। मनुष्य को चाहिए कि इसी योग-प्रक्रिया का पालन करे।
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All glories to saints and sages of the Supreme Lord
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥