श्रीमद् भागवतम
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भागवत पुराण  »  स्कन्ध 5: सृष्टि की प्रेरणा  »  अध्याय 19: जम्बूद्वीप का वर्णन  »  श्लोक 19

 
श्लोक
अस्मिन्नेव वर्षे पुरुषैर्लब्धजन्मभि: शुक्ललोहितकृष्णवर्णेन स्वारब्धेन कर्मणा दिव्यमानुषनारकगतयो बह्व्य: आत्मन आनुपूर्व्येण सर्वा ह्येव सर्वेषां विधीयन्ते यथावर्णविधानमपवर्गश्चापि भवति ॥ १९ ॥
 
शब्दार्थ
अस्मिन् एव वर्षे—इसी भूभाग (भारतवर्ष) में; पुरुषै:—पुरुषों के द्वारा; लब्ध-जन्मभि:—जन्म देने वालों के द्वारा; शुक्ल— सत्त्वगुण का; लोहित—रजोगुण का; कृष्ण—तमोगुण का; वर्णेन—वर्ण (विभाग) के अनुसार; स्व—स्वयं; आरब्धेन— प्रारम्भ किया हुआ; कर्मणा—कर्म के द्वारा; दिव्य—दिव्य, दैवी; मानुष—मानवीय; नारक—नारकीय; गतय:—गन्तव्य; बह्व्य:—अनेक; आत्मन:—स्वयं का; आनुपूर्व्येण—पूर्वजन्म के कर्मों के अनुसार; सर्वा:—समस्त; हि—निश्चय-पूर्वक; एव—निस्सन्देह; सर्वेषाम्—सबों का; विधीयन्ते—भाग्य में लिखा है; यथा-वर्ण-विधानम्—विभिन्न वर्णों के अनुसार; अपवर्ग:—मुक्ति का मार्ग; च—और; अपि—भी; भवति—सम्भव है ।.
 
अनुवाद
 
 इस भूभाग में जन्म लेने वाले व्यक्ति गुणों—सतोगुण, रजोगुण तथा तमोगुण—के अनुसार विभाजित हैं। इनमें से कुछ अत्यन्त महान् व्यक्तियों के रूप में, कुछ सामान्य व्यक्तियों के रूप में और कुछ अत्यन्त निम्न व्यक्तियों के रूप में जन्म लेते हैं, क्योंकि भारतवर्ष में मनुष्य का विगत कर्म के अनुसार जन्म होता है। यदि प्रामाणिक गुरु के द्वारा किसी भी मनुष्य की स्थिति निश्चित की जाये और यदि उसे चार वर्णों (ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य तथा शूद्र) तथा चार आश्रमों (ब्रह्मचारी, गृहस्थ, वानप्रस्थ तथा संन्यास) के अनुसार भगवान् विष्णु की सेवा में रत होने का सही-सही प्रशिक्षण दिया जाये तो उसका जीवन सफल हो सकता है।
 
तात्पर्य
 अधिक जानकारी के लिए भगवद्गीता (१४.१८ तथा १८.४२-४५) देखना चाहिए। श्रील रामानुजाचार्य ने अपनी पुस्तक वेदान्त संग्रह में लिखा है—
एवंविधपराभक्तिस्वरूपज्ञानविशेषस्योत्पादक: पूर्वोक्ताहरहरुपचीयमानज्ञानपूर्वककर्मानुगृहीतभक्तियोग एव; यथोक्तं भगवता पराशरेण—वर्णाश्रमेति। निखिलजगदुद्धारणायावनितलेऽवतीर्णं परमब्रह्मभूत: पुरुषोत्तम: स्वयमेतदुक्तवान्—“स्वकर्म-निरत: सिद्धिं यथा विन्दति तच्छृणु” “यत: प्रवृत्तिर्भूतानां येन सर्वमिदं ततम्। स्वकर्मणा तमभ्यर्च्य सिद्धिं विन्दति मानव: ॥ ”

महर्षि पराशर मुनि ने विष्णु-पुराण (३८९) से उद्धरण देते हुए संस्तुति की है— वर्णाश्रमाचारवता पुरुषेण पर: पुमान्।

विष्णुराराध्यते पंथा नान्यत्के तत्तोषकारणम् ॥

“वर्णाश्रम प्रणाली में उल्लिखित कर्तव्यों के सही-सही पालन द्वारा पूर्ण पुरुषोत्तम भगवान् विष्णु की आराधना की जाती है। भगवान् को तुष्ट करने का इसके अतिरिक्त अन्य कोई उपाय नहीं है।” भारतवर्ष में वर्णाश्रम-धर्म का सरलता से पालन हो सकता है। इस समय भारतवर्ष के कुछ आसुरी वर्ण वर्णाश्रम-धर्म प्रणाली की उपेक्षा कर रहे हैं। चूँकि लोगों को यह शिक्षा देने के लिए कि किस प्रकार ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य तथा शूद्र बना जा सकता है या ब्रह्मचारी, गृहस्थ, वानप्रस्थ तथा संन्यासी कैसे बना जाता है कोई संस्था नहीं है, अत: ये असुर वर्गहीन समाज चाहते हैं। इससे अव्यवस्था उत्पन्न हो रही है। धर्मनिरपेक्ष सरकार के नाम पर अयोग्य व्यक्ति सर्वोच्च शासकीय पद हथिया रहे हैं। किसी को भी वर्णाश्रम-धर्म के नियमों के अनुसार कार्य करने की शिक्षा नहीं दी जा रही है, जिससे मनुष्य अत्यन्त पतित हो कर पशु-जीवन की दिशा में अग्रसर हो रहे हैं। जीवन का मुख्य उद्देश्य मुक्ति है, किन्तु दुर्भाग्यवश मनुष्यों को मुक्ति का अवसर नहीं दिया जाता जिससे उनका जीवन विनष्ट हो रहा है। कृष्णभावनामृत आन्दोलन सम्पूर्ण विश्व में वर्णाश्रम-धर्म प्रणाली की पुन:-स्थापना करने और मानव समाज को नारकीय जीवन में गिरने से बचाने के लिए प्रवर्द्धित किया जा रहा है।

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All glories to saints and sages of the Supreme Lord
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥