श्रीमद् भागवतम
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भागवत पुराण  »  स्कन्ध 5: सृष्टि की प्रेरणा  »  अध्याय 19: जम्बूद्वीप का वर्णन  »  श्लोक 24

 
श्लोक
न यत्र वैकुण्ठकथासुधापगा
न साधवो भागवतास्तदाश्रया: ।
न यत्र यज्ञेशमखा महोत्सवा:
सुरेशलोकोऽपि न वै स सेव्यताम् ॥ २४ ॥
 
शब्दार्थ
न—नहीं; यत्र—जहां; वैकुण्ठ-कथा-सुधा-आपगा:—समस्त चिन्ताओं को दूर करने वाले श्रीवैकुण्ठ अर्थात् श्रीभगवान् की अमृतमयी धारा के समान कथा; न—न तो; साधव:—भक्तजन; भागवता:—श्रीभगवान् की सेवा में निरन्तर तत्पर; तत्- आश्रया:—श्रीभगवान् की शरण में गये; न—नहीं; यत्र—जहाँ; यज्ञ-ईश-मखा:—यज्ञों के स्वामी के प्रति की गई भक्ति; महा- उत्सवा:—जो वास्तविक उत्सव हैं; सुरेश-लोक:—स्वर्गवासियों का स्थान; अपि—यद्यपि; न—नहीं; वै—निश्चय ही; स:— उस; सेव्यताम्—सेवनीय ।.
 
अनुवाद
 
 जहाँ श्रीभगवान् की कथा रूपी विशुद्ध गंगा प्रवाहित नहीं होती और जहाँ पवित्रता की ऐसी नदी के तट पर सेवा में तल्लीन भक्तजन नहीं रहते, अथवा श्रीभगवान् को प्रसन्न करने के लिए जहाँ संकीर्तन-यज्ञ के उत्सव नहीं मनाये जाते, ऐसे स्थान में बुद्धिमान पुरुष के लिए रुचि नहीं होती। क्योंकि (इस युग में विशेषकर संकीर्तन-यज्ञ की संस्तुति की गई है)।
 
तात्पर्य
 श्री चैतन्य महाप्रभु का जन्म भारतवर्ष में, विशेष रूप से बंगाल के नदिया जिले में, हुआ जहां नवद्वीप स्थित है। अत: श्रील भक्तिविनोद ठाकुर के अनुसार यह निष्कर्ष निकलता है कि इस ब्रह्माण्ड के अन्तर्गत सर्वश्रेष्ठ लोक यह पृथ्वी है और इसी पर भारतवर्ष स्थित है; भारतवर्ष में ही बंगाल है जो इससे उत्तम है, बंगाल में नदिया जिला उससे भी उत्तम है और नदिया में नवद्वीप सर्वोत्तम है, क्योंकि यहीं श्री चैतन्य महाप्रभु का आविर्भाव हरे कृष्ण महामंत्र कीर्तन का शुभारम्भ करने के लिए हुआ। शास्त्रों का मत है—
कृष्णवर्णं त्विषाकृष्णं सांगोपांगास्त्रपार्षदं।

यज्ञै संकीर्तनप्रायैर्यजन्ति हि सुमेधस: ॥

श्री चैतन्य महाप्रभु के साथ सदैव ही उनके पार्षद, यथा श्रीनित्यानंद, श्रीगदाधर तथा श्रीअद्वैत एवं श्रीवास जैसे अनेक भक्त रहते हैं। वे सदैव भगवन्नाम का कीर्तन और श्रीकृष्ण का गुण-गान करते हैं। इसीलिए भारतवर्ष विश्वभर में सर्वश्रेष्ठ स्थान है। कृष्णभावनामृत आन्दोलन ने श्री चैतन्य महाप्रभु के जन्मस्थान मायापुर में अपना केन्द्र स्थापित कर रखा है, जिससे लोग वहाँ जायें और सतत चल रहे संकीर्तन-यज्ञ के उत्सव में भाग ले सकें जैसाकि महासंस्तुत है—यज्ञेष मखा महोत्सवा: तथा उन लाखों भूखे मनुष्यों को प्रसाद का वितरण कर सकें जो आध्यात्मिक उत्कर्ष के लिए लालायित हैं। कृष्णभावनामृत आन्दोलन का यही उद्देश्य है। इसकी पुष्टि चैतन्यभागवत में इस प्रकार की गई है— “भले ही स्वर्ग क्यों न हो, यदि वहाँ श्रीभगवान् के यश प्रसार करने का प्रचार नहीं हो पाता, यदि भगवान् के शुद्ध भक्त वैष्णवों का वहाँ चिह्न नहीं मिलता और कृष्णभावनामृत को प्रचारित करने वाले उत्सव वहाँ नहीं मनाये जाते, तो मनुष्य को ऐसे स्थान की कामना नहीं करनी चाहिए। इससे अच्छा तो यही है कि सदा-सर्वदा माता के गर्भ में वास रहे, जहाँ कम से कम भगवान् के चरणकमलों का स्मरण तो हो सकता है। मेरी यही प्रार्थना है कि मुझे ऐसे अधम स्थान में जन्म न लेना पड़े।” इसी प्रकार चैतन्यचरितामृत में कृष्णदास कविराज का कथन है कि चूँकि श्री चैतन्य महाप्रभु ही संकीर्तन आन्दोलन के प्रवर्तक हैं, अत: जो भी भगवान् को प्रसन्न करने के लिए संकीर्तन करता है, वह अत्यन्त भाग्यशाली है। ऐसा मनुष्य परम बुद्धिमान है, जबकि अन्य लोग भौतिक जीवन की अविद्या से ग्रस्त हैं। वैदिक साहित्य में जितने भी यज्ञों का उल्लेख है उनमें संकीर्तन यज्ञ सर्वश्रेष्ठ है। एक सौ अश्वमेघ यज्ञों की भी तुलना संकीर्तन यज्ञ से नहीं की जा सकती, चैतन्यचरितामृत के लेखक के अनुसार यदि कोई संकीर्तन यज्ञ की तुलना अन्य यज्ञों से करता है, तो वह पाखण्डी है और यमराज द्वारा दण्डित होगा। अनेक मायावादी संकीर्तन यज्ञ को अश्वमेध-यज्ञ तथा अन्य शुभ-आयोजनों के समान पवित्र कार्य मानते हैं, किन्तु ऐसा मानना नाम-अपराध है। मायावादी भले ही ऐसा सोचें, किन्तु नारायण के पवित्र नाम का संकीर्तन तथा अन्य नामों का संकीर्तन कभी भी एकसमान नहीं है।

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All glories to saints and sages of the Supreme Lord
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥