श्रीमद् भागवतम
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भागवत पुराण  »  स्कन्ध 5: सृष्टि की प्रेरणा  »  अध्याय 19: जम्बूद्वीप का वर्णन  »  श्लोक 25

 
श्लोक
प्राप्ता नृजातिं त्विह ये च जन्तवो
ज्ञानक्रियाद्रव्यकलापसम्भृताम् ।
न वै यतेरन्नपुनर्भवाय ते
भूयो वनौका इव यान्ति बन्धनम् ॥ २५ ॥
 
शब्दार्थ
प्राप्ता:—जिन्होंने प्राप्त कर लिया है; नृ-जातिम्—मनुष्य समाज में जन्म; तु—निश्चय ही; इह—इस भारत देश में; ये—वे जो; च—भी; जन्तव:—जीव; ज्ञान—ज्ञान से; क्रिया—कर्म से; द्रव्य—पदार्थों के; कलाप—समूह से; सम्भृताम्—पूर्ण; न—नहीं; वै—निश्चित रूप से; यतेरन्—प्रयत्न; अपुन:-भवाय—अमर-पद के लिए; ते—ऐसे व्यक्ति; भूय:—पुन:; वनौका:—पक्षियों; इव—जैसा; यान्ति—जाते हैं; बन्धनम्—बन्धन को ।.
 
अनुवाद
 
 भक्ति के लिए भारतवर्ष में उपयुक्त क्षेत्र तथा परिस्थितियाँ उपलब्ध हैं, जिस भक्ति से ज्ञान तथा कर्म के फलों से मुक्त हुआ जा सकता है। यदि कोई भारतवर्ष में मनुष्य देह धारण करके संकीर्तन-यज्ञ नहीं करता तो वह उन जंगली पशुओं तथा पक्षियों की भाँति है जो मुक्त किये जाने पर भी असावधान रहते हैं और शिकारी द्वारा पुन: बन्दी बना लिए जाते हैं।
 
तात्पर्य
 भारतवर्ष ऐसा देश है, जिसमें श्रवणं कीर्तनं विष्णो: वाले संकीर्तन यज्ञ को अथवा स्मरणं अर्चनं दास्यं सख्यं तथा आत्मनिवेदनं जैसी अन्य भक्ति-विधियों को सरलतापूर्वक सम्पन्न किया जा सकता है। भारतवर्ष में ही अनेक पवित्र स्थानों को देखने का अवसर प्राप्त है जिनमें श्री चैतन्य महाप्रभु का जन्म-स्थान नवद्वीप तथा भगवान् श्रीकृष्ण का जन्म-स्थान वृन्दावन मुख्य हैं, जहाँ के अनेक शुद्ध भक्तों की एकमात्र अभिलाषा भक्ति है (अन्याभिलाषिताशून्यं ज्ञानकर्माद्यनावृतम् )। इस प्रकार से प्राणी भौतिक बन्धनों से छूट जाता है। अन्य मार्ग, यथा ज्ञान मार्ग तथा कर्म-मार्ग उतने लाभप्रद नहीं हैं। पुण्यकार्यों से स्वर्ग प्राप्त हो सकता है और ज्ञान-मीमांसा से ब्रह्मभूत हुआ जा सकता है, किन्तु यह वास्तविक लाभ नहीं, क्योंकि मनुष्य को पुन: नीचे आना पड़ता है। मनुष्य को चाहिए कि वह भगवान् के धाम वापस पहुँचने के लिए प्रयास
करे (यान्ति मद्याजिनोऽपि माम् ) अन्यथा मनुष्य जीवन तथा जंगली पशु-पक्षियों के जीवन में कोई अन्तर नहीं है। पशु तथा पक्षी भी स्वतंत्र होते हैं, किन्तु निम्न योनि में जन्मने के कारण वे स्वतंत्रता का उपभोग नहीं कर पाते। अत: भारतवर्ष में जन्म लेने वाले प्रत्येक मनुष्य को जो भी सुविधाएँ प्राप्त हैं, उनका उपयोग करते हुए उसे प्रबुद्ध भक्त बनकर भगवान् के धाम वापस जाना चाहिए। कृष्णभावनामृत आन्दोलन का यही विषय है। भारतवर्ष के अतिरिक्त अन्य सभी देशों के वासियों को भौतिक सुख-सुविधाएँ तो प्राप्त हैं, किन्तु उन्हें कृष्णभक्ति प्राप्त करने की वैसी ही सुविधा प्राप्त नहीं है। अत: श्री चैतन्य महाप्रभु का उपदेश है कि जिस किसी ने भारत भूमि में मनुष्य रूप में जन्म लिया है उसे अपने आपको श्रीकृष्ण का अंश मानना चाहिए और कृष्णभावनामृत प्राप्त कर लेने के पश्चात् समग्र विश्व में इस ज्ञान का वितरण करना चाहिए।
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All glories to saints and sages of the Supreme Lord
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥