श्रीमद् भागवतम
शब्द आकार

भागवत पुराण  »  स्कन्ध 5: सृष्टि की प्रेरणा  »  अध्याय 19: जम्बूद्वीप का वर्णन  »  श्लोक 29-30

 
श्लोक
श्रीशुक उवाच
जम्बूद्वीपस्य च राजन्नुपद्वीपानष्टौ हैक उपदिशन्ति सगरात्मजैरश्‍वान्वेषण इमां महीं परितो निखनद्भ‍िरुपकल्पितान् ॥ २९ ॥ तद्यथा स्वर्णप्रस्थश्चन्द्रशुक्ल आवर्तनो रमणको मन्दरहरिण: पाञ्चजन्य: सिंहलो लङ्केति ॥ ३० ॥
 
शब्दार्थ
श्री-शुक: उवाच—श्रीशुकदेव गोस्वामी बोले; जम्बूद्वीपस्य—जम्बूद्वीप का; च—भी; राजन्—हे राजा; उपद्वीपान् अष्टौ—आठ उपद्वीप; ह—निश्चय ही; एके—कुछेक; उपदिशन्ति—विद्वान बताते हैं; सगर-आत्म-जै:—महाराज सगर के पुत्रों द्वारा; अश्व- अन्वेषणे—खोये हुए घोड़े को ढूँढते समय; इमाम्—इस; महीम्—भूभाग को; परित:—चारों ओर; निखनद्भि:—खोदते हुए; उपकल्पितान्—सृष्टि की; तत्—उस; यथा—निम्नलिखित प्रकार से; स्वर्ण-प्रस्थ:—स्वर्ण-प्रस्थ; चन्द्र-शुक्ल:—चन्द्रशुक्ल; आवर्तन:—आवर्तन; रमणक:—रमणक; मन्दर-हरिण:—मन्दरहरिण; पाञ्चजन्य:—पांचजन्य; सिंहल:—सिंहल; लङ्का— लंका; इति—इस प्रकार ।.
 
अनुवाद
 
 श्रीशुकदेव गोस्वामी बोले—हे राजन्, कुछ ज्ञानी पुरुषों के मत के अनुसार जम्बूद्वीप के चारों ओर आठ छोटे-छोटे द्वीप हैं। जब महाराज सगर के पुत्र अपने खोये हुए घोड़े की खोज सारे संसार में कर रहे थे, तो उन्होंने पृथ्वी को खोद डाला। इस प्रकार से निकटस्थ आठ द्वीप अस्तित्व में आए। इन द्वीपों के नाम हैं—स्वर्णप्रस्थ, चन्द्रशुक्ल, आवर्तन, रमणक, मन्दरहरिण, पांचजन्य, सिंहल तथा लंका।
 
तात्पर्य
 कूर्म पुराण में देवताओं की इच्छाओं के सम्बन्ध में निम्नलिखित कथन मिलता है— अनधिकारिणो देवा: स्वर्गस्था भारतोद्भवम्।
वांछन्त्य् आत्मविमोक्षार्थमुद्रेकार्थेऽधिकारिण: ॥

यद्यपि देवता स्वर्गलोक में उच्च पदों पर आसीन हैं फिर भी वे मर्त्यलोक में भारतवर्ष की भूमि पर उतरने के लिए उत्सुक रहते हैं। इससे संकेत मिलता है कि देवता भी भारतवर्ष में रहने के लिए योग्य नहीं हैं। अत: यदि भारतवर्ष में जन्म लेने वाला प्राणी कुत्ते-बिल्ली की तरह रहे और इस भूमि में जन्म प्राप्त करने का लाभ न उठाए तो वह सचमुच ही अभागा है।

____________________________
 
All glories to saints and sages of the Supreme Lord
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥