श्रीमद् भागवतम
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भागवत पुराण  »  स्कन्ध 5: सृष्टि की प्रेरणा  »  अध्याय 19: जम्बूद्वीप का वर्णन  »  श्लोक 3

 
श्लोक
ॐ नमो भगवते उत्तमश्लोकाय नम आर्यलक्षणशीलव्रताय नम उपशिक्षितात्मन उपासितलोकाय नम: साधुवादनिकषणाय नमो ब्रह्मण्यदेवाय महापुरुषाय महाराजाय नम इति ॥ ३ ॥
 
शब्दार्थ
ओम्—हे भगवान्; नम:—नमस्कार है; भगवते—श्रीभगवान् को; उत्तम-श्लोकाय—जिनकी अर्चना सदैव उत्तम श्लोकों से की जाती है; नम:—मेरा नमस्कार; आर्य-लक्षण-शील-व्रताय—जिसमें उत्तम पुरुषों के समस्त गुण विद्यमान हैं; नम:—मेरा नमस्कार; उपशिक्षित-आत्मने—आपको जिनकी इन्द्रियाँ वश में हैं; उपासित-लोकाय—जो समस्त श्रेणियों के लोगों द्वारा सदैव पूजित हैं; नम:—मेरा नमस्कार; साधु-वाद-निकषणाय—श्रीभगवान् को जो गुणों के परखने की कसौटी तुल्य हैं; नम:—मेरा नमस्कार; ब्रह्मण्य-देवाय—जो सुयोग्य ब्राह्मणों द्वारा पूजित हैं; महा-पुरुषाय—श्रीभगवान् को जो इस भौतिक सृष्टि का कारण होने की वज़ह से पुरुष-सूक्त द्वारा पूजित हैं; महा-राजाय—सभी राजाओं में श्रेष्ठ महाराज को; नम:—मेरा नमस्कार; इति—इस प्रकार ।.
 
अनुवाद
 
 हे प्रभो, मैं ॐ कार बीजमंत्र के जप से आपको प्रसन्न करना चाहता हूँ। मैं उन श्रीभगवान् को सादर नमस्कार करता हूँ जो उत्तम पुरुषों में सर्वाधिक हैं। आप आर्यजनों के समस्त उत्तम गुणों के भंडार हैं। आपके गुण तथा आचरण सदैव एकसमान रहने वाला है और आप अपनी इन्द्रियों तथा मन को सदैव अपने वश में रखने वाले हैं। सामान्य व्यक्ति की भाँति आप आदर्श चरित्र प्रस्तुत करके अन्यों को आचरण करना सिखाते हैं। कसौटी केवल स्वर्ण के गुण की परीक्षा करने में समर्थ है, किन्तु आप ऐसे स्पर्श-मणि हैं, जिससे समस्त उत्तम गुणों की परीक्षा हो जाती है। आप भक्तों में अग्रणी ब्राह्मणों के द्वारा उपासित हैं। हे परम पुरुष, आप महाराजा हैं, अत: मैं आपको सादर नमस्कार करता हूँ।
 
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All glories to saints and sages of the Supreme Lord
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥