श्रीमद् भागवतम
शब्द आकार

भागवत पुराण  »  स्कन्ध 5: सृष्टि की प्रेरणा  »  अध्याय 19: जम्बूद्वीप का वर्णन  »  श्लोक 5

 
श्लोक
मर्त्यावतारस्त्विह मर्त्यशिक्षणं
रक्षोवधायैव न केवलं विभो: ।
कुतोऽन्यथा स्याद्रमत: स्व आत्मन:
सीताकृतानि व्यसनानीश्वरस्य ॥ ५ ॥
 
शब्दार्थ
मर्त्य—मनुष्य; अवतार:—जिसका अवतार; तु—तो भी; इह—इस लोक में; मर्त्य-शिक्षणम्—समस्त जीवों को, विशेष रूप से मनुष्य को शिक्षा देने के लिए; रक्ष:-वधाय—रावण असुर को मारने के लिए; एव—निश्चय ही; न—नहीं; केवलम्—केवल, मात्र; विभो:—श्रीभगवान् का; कुत:—कहाँ से; अन्यथा—अन्यथा; स्यात्—होगा; रमत:—रमण करने वाले का; स्वे—अपने आप में; आत्मन:—ब्रह्माण्ड का आत्म-स्वरूप; सीता—भगवान् रामचन्द्र की पत्नी सीता का; कृतानि—वियोग के कारण उत्पन्न; व्यसनानि—समस्त दुख; ईश्वरस्य—श्रीभगवान् के ।.
 
अनुवाद
 
 राक्षसों के नायक रावण को यह वर प्राप्त था कि उसका वध मनुष्य ही कर सकता है, इसलिए पूर्ण पुरुषोत्तम भगवान् रामचन्द्र को मनुष्य रूप धारण करना पड़ा, किन्तु भगवान् रामचन्द्र का उद्देश्य मात्र रावण का वध करना ही नहीं था। वे तो मर्त्य-प्राणियों को यह शिक्षा देना चाहते थे कि भोग विलास अथवा पत्नी के चारों ओर केन्द्रित भौतिक सुख समस्त दुखों का कारण है। वे स्वयं में पूर्ण हैं और उन्हें किसी भी प्रकार का पश्चात्ताप नहीं है। अत: भला वे माता सीता के अपहरण से क्या कष्ट भोगते?
 
तात्पर्य
 जैसाकि भगवद्गीता (४.९) में कहा गया है, इस जगत में श्रीभगवान् दो उद्देश्यों से मनुष्य रूप धारण करते हैं—परित्राणाय साधूनां विनाशाय च दुष्कृताम्—असुरों का वध करने और अपने भक्तों की रक्षा करने के हेतु। भक्तों की रक्षा करने के लिए वे न केवल अपनी उपस्थिति से वरन् भक्ति पर दृढ़ रहने की शिक्षा देकर उन्हें तुष्ट करते हैं। भगवान् रामचन्द्र ने अपने भक्तों को यह शिक्षा दी कि वैवाहिक जीवन में प्रवेश न करना बेहतर है क्योंकि इसीसे ही सारे कष्ट झेलने पड़ते हैं। जैसाकि श्रीमद्भागवत (७.९.४५) में पुष्टि की गई है—
यन्मैथुनादि गृहमेधिसुखं हि तुच्छं कण्डूयनेन करयोरिव दु:खदु:खम्।

तृप्यन्ति नेह कृपणा बहुदु:खभाज: कण्डूतिवन्मनसिजं विषहेतधीर: ॥

आत्मज्ञान में समुन्नत न होने वाले कृपण, जो ब्राह्मणों से सर्वथा विपरीत हैं, गृहस्थ जीवन स्वीकार करते हैं जिसमें संभोग की छूट है और वे पुन: पुन: इन्द्रियसुख भोगते हैं यद्यपि इस इन्द्रियसुख के पश्चात् उन्हें नाना प्रकार के कष्ट उठाने पड़ते हैं। भक्तों के लिए यह चेतावनी है। भक्तों को तथा सारे मानव समाज को यह शिक्षा देने के लिए ही श्रीरामचन्द्रजी ने श्रीभगवान् होते हुए भी नाना प्रकार के कष्टों को सहा, क्योंकि माता सीता को उन्होंने अर्द्धांगिनी के रूप में स्वीकार किया था। निस्सन्देह, उन्होंने सारे कष्ट इसलिए झेले कि हमें शिक्षा मिले; वास्तव में उनके द्वारा पश्चात्ताप करने का कोई प्रयोजन नहीं था।

भगवान् की शिक्षाओं का एक दूसरा पक्ष यह भी है कि एक बार पत्नी बना लेने के बाद मनुष्य को सत्यनिष्ठ होकर पत्नी की सब प्रकार से रक्षा करनी चाहिए। मानव समाज में दो प्रकार के मनुष्य पाये जाते हैं—वे जो धार्मिक नियमों का निष्ठा से पालन करते हैं तथा वे जो भक्त हैं। भगवान् रामचन्द्र अपने चरित्र से इन दोनों प्रकार के लोगों को यह बताना चाहते थे कि किस प्रकार धार्मिक नियमों का पालन करते हुए प्रिय तथा कर्तव्यनिष्ठ पति बना जा सकता है; अन्यथा भगवान् राम को इतने कष्ट उठाने की कोई आवश्यकता नहीं थी। धार्मिक नियमों का पालन करने वालों को चाहिए कि वे अपनी पत्नी की रक्षा करने में उपेक्षा न बरतें। हो सकता है कि ऐसा करने में कुछ कष्ट उठाने पड़ें, किन्तु पति को इन्हें सहना ही चाहिए। सत्यनिष्ठ पति का यही कर्तव्य है। अपने साक्षात् दृष्टान्त से भगवान् रामचन्द्रजी ने इस कर्तव्य का प्रदर्शन किया। भगवान् रामचन्द्र चाहते तो अपनी इच्छाशक्ति से हजारों सीताएँ उत्पन्न कर सकते थे, किन्तु सत्यनिष्ठ पति का कर्तव्य निभाने के लिए ही न केवल रावण से सीता की रक्षा की, वरन् रावण का पूरे परिवार के साथ संहार किया।

भगवान् रामचन्द्र की शिक्षाओं का एक पक्ष यह भी है कि भगवान् विष्णु तथा उनके भक्तों को भले ही ऊपर से सांसारिक यातनाएँ झेलनी पड़ें, किन्तु इन यातनाओं से उनका कोई सरोकार नहीं है। वे तो सभी परिस्थितियों में मुक्त पुरुष हैं। इसीलिए श्रीचैतन्य भागवत में कहा गया है— यत देख वैष्णवेर व्यवहार दु:ख।

निश्चय जानिह ताहा परमानन्द-सुख ॥

भक्ति में मग्न रहने के कारण वैष्णव सदैव दिव्य आनन्द का लाभ उठाता है। भले ही ऐसा लगे कि उसे भौतिक कष्ट है, किन्तु उसे दिव्य विरह अवस्था प्राप्त रहती है। प्रेमी तथा प्रेमिका को भले ही वियोग कष्टकर लगता हो, किन्तु वास्तव में यह होता है अत्यन्त आनन्ददायक। अत: सीतादेवी से भगवान् रामचन्द्र का वियोग तथा उसके बाद उनके द्वारा भोगी जाने वाली यातनाएँ एक प्रकार से उनके दिव्य-सुख को प्रकट करने वाली हैं। ऐसा श्रील विश्वनाथ चक्रवर्ती ठाकुर का अभिमत है।

____________________________
 
All glories to saints and sages of the Supreme Lord
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥