श्रीमद् भागवतम
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भागवत पुराण  »  स्कन्ध 5: सृष्टि की प्रेरणा  »  अध्याय 19: जम्बूद्वीप का वर्णन  »  श्लोक 8

 
श्लोक
सुरोऽसुरो वाप्यथ वानरो नर:
सर्वात्मना य: सुकृतज्ञमुत्तमम् ।
भजेत रामं मनुजाकृतिं हरिं
य उत्तराननयत्कोसलान्दिवमिति ॥ ८ ॥
 
शब्दार्थ
सुर:—देवता; असुर:—असुर; वा अपि—अथवा; अथ—अत:; वा—अथवा; अनर:—मनुष्य के अतिरिक्त (पशु-पक्षी इत्यादि); नर:—मनुष्य; सर्व-आत्मना—सब प्रकार से, हृदय से; य:—जो; सु-कृतज्ञम्—सरलता से आज्ञाकारी बनाया गया; उत्तमम्—सर्वोत्कृष्ट; भजेत—पूजा करनी चाहिए; रामम्—श्रीरामचन्द्र को; मनुज-आकृतिम्—मनुष्य रूप में प्रकट होकर; हरिम्—श्रीभगवान् को; य:—जो; उत्तरान्—उत्तरी भारत के; अनयत्—वापस ले गये; कोसलान्—कोशल देश, अयोध्यावासियों को; दिवम्—आध्यात्मिक जगत या वैकुण्ठ लोक में; इति—इस प्रकार ।.
 
अनुवाद
 
 अत: चाहे सुर हो या असुर, मनुष्य हो या मनुष्येतर प्राणी जैसे पशु या पक्षी, प्रत्येक को उन पूर्ण पुरुषोत्तम भगवान् रामचन्द्र की पूजा करनी चाहिए जो इस पृथ्वी पर मनुष्य के रूप में प्रकट होते हैं। भगवान् की पूजा के लिए किसी कठोर तप या साधना की आवश्यकता नहीं है, क्योंकि वे अपने भक्त की तुच्छ सेवा को भी स्वीकार करने वाले हैं। इस प्रकार से वे तुष्ट हो जाते हैं और उनके तुष्ट होते ही भक्त सफल हो जाता है। निस्सन्देह, श्रीरामचन्द्र अयोध्या के समस्त भक्तों को वैकुण्ठ धाम वापस ले गये।
 
तात्पर्य
 भगवान् श्रीरामचन्द्र अपने भक्तों के प्रति इतने दयालु हैं कि वे किसी के द्वारा, चाहे मनुष्य हो या कुछ और, थोड़ी भी सेवा किये जाने पर सरलता से प्रसन्न हो जाते हैं। भगवान् श्रीरामचन्द्र की पूजा करने का यही लाभ है। ऐसा ही लाभ श्री चैतन्य महाप्रभु की पूजा करने से होता है। श्रीकृष्ण तथा श्रीरामचन्द्र ने कभी कभी क्षत्रियों की भाँति असुरों का वध करके अपनी दया का प्रदर्शन किया, किन्तु भगवान् श्री चैतन्य महाप्रभु ने असुरों तक को सहज ही भगवत्प्रेम प्रदान किया। श्रीभगवान् के
समस्त अवतारों ने विशेषत: श्रीरामचन्द्र, श्रीकृष्ण तथा बाद में भगवान् श्री चैतन्य महाप्रभु ने पूर्ववर्ती अनेक जीवात्माओं को मोक्ष प्रदान किया। अत: श्री चैतन्य महाप्रभु को षड्भुज मूर्ति के रूप में प्रदर्शित किया जाता है जो श्रीराम, श्रीकृष्ण तथा श्री चैतन्य महाप्रभु इन तीनों का सम्मिलित रूप है। मनुष्य जीवन का परम उद्देश्य भगवान् के इस षड्भुज-रूप श्री रामचन्द्र की दो भुजाएं, श्रीकृष्ण की दो और श्री चैतन्य महाप्रभु की दो भुजाएँ की आराधना से ही प्राप्त हो जाता है।
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All glories to saints and sages of the Supreme Lord
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥