श्रीमद् भागवतम
 
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भागवत पुराण  »  स्कन्ध 5: सृष्टि की प्रेरणा  »  अध्याय 2: महाराज आग्नीध्र का चरित्र  » 
 
 
 
 
संक्षेप विवरण:  इस अध्याय में महाराज आग्नीध्र के चरित्र का वर्णन किया गया है। जब महाराज प्रियव्रत आत्म- साक्षात्कार के हेतु चले गये, तो उनका पुत्र आग्नीध्र उनकी आज्ञानुसार जम्बूद्वीप...
 
श्लोक 1:  श्री शुकदेव गोस्वामी आगे बोले—अपने पिता महाराज प्रियव्रत के इस प्रकार आध्यात्मिक जीवन पथ अपनाने के लिए तपस्या में संलग्न हो जाने पर राजा आग्नीध्र ने उनकी आज्ञा का पूरी तरह पालन किया और धार्मिक नियमों के अनुसार उन्होंने जम्बूद्वीप के वासियों को अपने ही पुत्रों के समान सुरक्षा प्रदान की।
 
श्लोक 2:  एक बार महाराज आग्नीध्र ने सुयोग्य पुत्र प्राप्त करने तथा पितृलोक का वासी बनने की कामना से भौतिक सृष्टि के स्वामी भगवान् ब्रह्मा की आराधना की। वे मंदराचल की घाटी में गये जहाँ स्वर्गलोक की सुन्दरियाँ विहार करने आती हैं। वहाँ उन्होंने वाटिका से फूल तथा अन्य आवश्यक सामग्री एकत्र की और फिर कठिन तप तथा उपासना में लग गये।
 
श्लोक 3:  इस ब्रह्माण्ड के सर्वशक्तिमान तथा आदि पुरुष भगवान् ब्रह्मा ने राजा आग्नीध्र की अभिलाषा जानकर अपनी सभा की श्रेष्ठ अप्सरा को, जिसका नाम पूर्वचित्ति था, चुनकर राजा के पास भेजा।
 
श्लोक 4:  श्री ब्रह्मा द्वारा भेजी गई अप्सरा उस उपवन के निकट विचरने लगी जहाँ राजा ध्यान में लगकर आराधना कर रहा था। वह उपवन सघन वृक्षों तथा स्वर्णिम लताओं के कारण अत्यन्त रमणीय था। वहाँ स्थल पर मयूर जैसे अनेक पक्षियों के जोड़े और सरोवर में बत्तख तथा हंस सुमधुर कूजन कर रहे थे। इस प्रकार वह उपवन वृक्षों, निर्मल जल, कमल पुष्प तथा सुमधुर कूजन करते विविध पक्षियों के कारण अत्यन्त सुन्दर लग रहा था।
 
श्लोक 5:  ज्योंही अत्यन्त मनोहर गति तथा हावभाव से युक्त पूर्वचित्ति उस पथ से निकली त्योंही प्रत्येक पग पर उसके चरण-नूपुरों की झंकार निकलने लगी। यद्यपि राजकुमार आग्नीध्र अधखुले नेत्रों से योग साध कर इन्द्रियों को वश में कर रहे थे, किन्तु अपने कमल सदृश नेत्रों से वे उसे देख सकते थे। तभी उन्हें उसके कंगनों की मधुर झंकार सुनाई दी। उन्होंने अपने नेत्रों को कुछ और खोला, तो देखा कि वह उनके बिल्कुल निकट थी।
 
श्लोक 6:  वह अप्सरा सुन्दर तथा आकर्षक फूलों को मधुमक्खी के समान सूँघ रही थी। वह अपनी चपल गति, लज्जा, विनय, चितवन तथा मुख से निकलने वाली मधुर ध्वनि और अपने अंगों की गति से मनुष्यों तथा देवताओं के मन तथा ध्यान को आकर्षित करने वाली थी। इन सब गुणों के कारण उसने मनुष्यों के मनों में कुसुम धनुषधारी कामदेव के स्वागतार्थ कानों के मार्ग खोल दिये थे। जब वह बोलती, तो उसके मुख से अमृत झरता था। उसके श्वास लेने पर श्वास का स्वाद लेने के लिए भौंरे मदान्ध होकर उसके कमलवत् नेत्रों के चारों ओर मँडराने लगते। इन भौंरों से विचलित होकर वह जल्दी-जल्दी चलने का प्रयत्न करने लगी, किन्तु जल्दी चलने के लिए पैर उठाते ही उसके केश, उसकी करधनी तथा उसके जलकलश तुल्य स्तन इस प्रकार गति कर रहे थे, जिससे वह अत्यन्त मनोहर एवं आकर्षक लग रही थी। दरअसल ऐसा प्रतीत होता था मानो वह अत्यन्त बलशाली कामदेव के लिए प्रवेश-मार्ग बना रही हो। अत: राजकुमार उसे देखकर पूर्णतया वशीभूत हो गया और उससे इस प्रकार बोला।
 
श्लोक 7:  राजकुमार ने भूल से अप्सरा को सम्बोधित किया—हे मुनिवर्य, तुम कौन हो? इस पर्वत पर क्यों आये हो और क्या करना चाहते हो? क्या तुम भगवान् की कोई माया हो? तुम बिना डोरी वाले इन दो धनुषों को क्यों धारण किये हो? क्या इनसे कोई तुम्हारा प्रयोजन है या अपने मित्र के लिए इन्हें धारण किये हुए हो? सम्भवत: तुम इन्हें इस वन के मतवाले (पागल) पशुओं को मारने के लिए धारण किये हो।
 
श्लोक 8:  तब आग्नीध्र ने पूर्वचित्ति के बाँके नेत्रों को देखा और कहा—हे मित्र, तुम्हारे बाँके नेत्र दो अत्यन्त शक्तिशाली बाण हैं। इन बाणों में कमल पुष्प की पंखुडिय़ों जैसे पंख हैं। मूठरहित होने पर भी वे अत्यन्त सुन्दर हैं और उनके सिरे नुकीले तथा भेदने वाले हैं। वे अत्यन्त शान्त लगते हैं जिससे ऐसा प्रतीत होता है कि वे किसी पर नहीं छोड़े जाएँगे। तुम इस वन में किसी न किसी को इन बाणों से बेधने के लिए विचरण कर रहे होगे, किन्तु किसे? यह मैं नहीं जानता। मेरी बुद्धि भी मन्द पड़ गई है और मैं तुम्हारा सामना नहीं कर सकता। दरअसल, पराक्रम में कोई भी तुम्हारी बराबरी नहीं कर सकता; इसीलिए मेरी प्रार्थना है कि तुम्हारा पराक्रम मेरे लिए कल्याणकारी हो।
 
श्लोक 9:  पूर्वचित्ति का अनुगमन करने वाले भौरों को देखकर महाराज आग्नीध्र बोले—भगवन्, ऐसा प्रतीत होता है मानो तुम्हारे शरीर को घेरे हुए ये भौंरे अपने पूज्य गुरु को घेरे हुए शिष्य हैं। वे सामवेद तथा उपनिषद् के मंत्रों का निरन्तर गायन कर रहे हैं और इस प्रकार तुम्हारी स्तुति कर रहे हैं। जैसे ऋषिगण वैदिक शास्त्रों की शाखाओं का अनुसरण करते हैं, ये भौंरें तुम्हारी चोटी से झडऩे वाले पुष्पों का आनन्द ले रहे हैं।
 
श्लोक 10:  हे ब्राह्मण, मुझे तो तुम्हारे नूपुरों की झंकार ही सुनाई पड़ती है। ऐसा लगता है उनके भीतर तीतर पक्षी चहक रहे हैं। मैं उनके रूपों को नहीं देख रहा, किन्तु मैं सुन रहा हूँ कि वे किस प्रकार चहक रहे हैं। जब मैं तुम्हारे सुन्दर गोल नितम्बों को देखता हूँ, तो मुझे लगता है कि मानो वे कदम्ब के पुष्पों का सुन्दर रंग लिए हों। तुम्हारी कमर में जाज्वल्यमान अंगारों की मेखला पड़ी हुई है। दरअसल, ऐसा लगता है कि तुम वस्त्र धारण करना भूल गये हो।
 
श्लोक 11:  तब आग्नीध्र ने पूर्वचित्ति के उभरे हुए उरोजों की प्रशंसा की। उन्होंने कहा—हे ब्राह्मण, तुम्हारी कमर अत्यन्त पतली है, किन्तु फिर भी तुम कष्ट सह कर इन दो सींगों को धारण कर रहे हो जिन पर मेरे नेत्र अटक गये हैं। इन दोनों सुन्दर सीगों के भीतर क्या भरा है? तुमने इनके ऊपर सुगन्धित लाल-लाल चूर्ण छिडक़ रखा है मानो अरुणोदय का सूर्य हो। हे भाग्यवान्, क्या मैं पूछ सकता हूँ कि तुम्हें ऐसा सुगन्धित चूर्ण कहाँ से मिला जो मेरे आश्रम को सुरभित कर रहा है?
 
श्लोक 12:  मित्रवर, क्या तुम मुझे अपना निवास स्थान दिखा सकते हो? मैं कल्पना भी नहीं कर सकता कि उस स्थान के वासियों को तुम्हारे उन्नत उरोजों के समान अद्भुत् शारीरिक अंग किस तरह प्राप्त हुए हैं, जो मुझ जैसे देखने वाले के मन तथा नेत्रों को उद्वेलित कर रहे हैं। उनकी मधुर वाणी तथा मृदु मुस्कान से इस निर्णय पर पहुँचा हूँ कि उनके मुख में अमृत बसता होगा।
 
श्लोक 13:  मित्रवर, शरीर पालने के लिए तुम क्या खाते हो? ताम्बूल चबाने से तुम्हारे मुख से सुगन्ध फैल रही है। इससे यह सिद्ध होता है कि तुम सदैव विष्णु का प्रसाद खाते हो। निश्चय ही तुम भगवान् विष्णु के अंश स्वरूप हो। तुम्हारा मुख मनोहर सरोवर के समान सुन्दर है। तुम्हारे रत्नजटित कुंडल उन दो उज्ज्वल मकरों के तुल्य हैं जिनके नेत्र विष्णु के समान अपलक रहने वाले हैं। तुम्हारे दोनों नेत्र दो चंचल मछलियों के सदृश हैं। इस प्रकार तुम्हारे मुख-सरोवर में दो मकर तथा दो चंचल मछलियाँ एक साथ तैर रही हैं। इनके अतिरिक्त तुम्हारे दाँतों की धवल पंक्ति जल में श्वेत हंसों की पंक्ति के सदृश प्रतीत होती है और तुम्हारे बिखरे बाल तुम्हारे मुख की शोभा का पीछा करने वाले भौंरों के झुंड के समान हैं।
 
श्लोक 14:  मेरा मन पहले ही से चंचल है और तुम इस गेंद को अपनी कमल सदृश हथेली से इधर-उधर फेंक कर मेरे नेत्रों को विक्षुब्ध कर रहे हो। तुम्हारे घुँघराले केश अब बिखरे हुए हैं, किन्तु तुम्हें उनको सँभालने की सुधि नहीं है। तुम इन्हें सँभाल क्यों नहीं लेते? यह धूर्त वायु स्त्रियों में आसक्त लम्पट पुरुष के समान तुम्हारे अधोवस्त्र को उठाने का प्रयत्न कर रहा है। क्या तुम्हें इसकी खबर नहीं है?
 
श्लोक 15:  हे श्रेष्ठ तपस्वी, तुम्हें दूसरों की तपस्या को भंग करने वाला यह अद्भुत् रूप कहाँ से प्राप्त हुआ? तुमने यह कला कहाँ से सीखी? हे मित्र, तुमने इस सुन्दरता को प्राप्त करने के लिए कौन सा तप किया है? मेरी इच्छा है कि तुम मेरे साथ तपस्या में सम्मिलित हो जाओ, क्योंकि हो सकता है कि इस ब्रह्माण्ड के स्रष्टा भगवान् ब्रह्मा ने मुझ पर प्रसन्न होकर तुम्हें मेरी पत्नी बनने के लिए भेजा हो।
 
श्लोक 16:  ब्राह्मणों के द्वारा पूजित भगवान् ब्रह्मा ने मुझपर अत्यन्त अनुग्रह करके तुमको मुझे दिया है; इसलिए मैं तुमसे मिल पाया हूँ। मैं तुम्हारा साथ नहीं छोडऩा चाहता, क्योंकि मेरे मन तथा नेत्र तुम्हीं पर टिके हुए हैं और वे किसी तरह दूर नहीं किये जा सकते। हे सुन्दर उन्नत उरोजों वाली बाला, मैं तुम्हारा अनुचर हूँ। तुम मुझे जहाँ भी चाहे ले जा सकती हो और तुम्हारी सखियाँ भी मेरे साथ चल सकती हैं।
 
श्लोक 17:  श्रील शुकदेव गोस्वामी आगे बोले—महाराज आग्नीध्र देवताओं के समान बुद्धिमान और स्त्रियों को रिझा करके अपने पक्ष में कर लेने की कला में अत्यन्त निपुण थे। अत: उन्होंने उस स्वर्गकन्या को अपनी कामपूर्ण वाणी से प्रसन्न करके उसको अपने पक्ष में कर लिया।
 
श्लोक 18:  आग्नीघ्र की बुद्धि, तरुणाई, सौन्दर्य, आचरण, ऐश्वर्य तथा उदारता से आकर्षित होकर पूर्वचित्ति जम्बूद्वीप के राजा तथा समस्त वीरों के स्वामी आग्नीध्र के साथ कई हजार वर्षों तक रही और उसने भौतिक तथा स्वर्गिक दोनों प्रकार के सुखों का भरपूर भोग किया।
 
श्लोक 19:  राजाओं में श्रेष्ठ महाराज आग्नीध्र को पूर्वचित्ति के गर्भ से नौ पुत्र प्राप्त हुए जिनके नाम नाभि, किम्पुरुष, हरिवर्ष, इलावृत, रम्यक, हिरण्मय, कुरु, भद्राश्व तथा केतुमाल थे।
 
श्लोक 20:  पूर्वचित्ति ने प्रति वर्ष एक-एक करके इन नौ पुत्रों को जन्म दिया, किन्तु जब वे बड़े हो गये, तो वह उन्हें घर पर छोडक़र ब्रह्मा की उपासना करने के लिए उनके पास उपस्थित हुई।
 
श्लोक 21:  अपनी माँ का दूध पीने के कारण आग्नीध्र के नवों पुत्र अत्यन्त बलिष्ठ एवं सुगठित शरीर वाले हुए। उनके पिता ने प्रत्येक को जम्बूद्वीप का एक-एक भाग दे दिया। इन राज्यों के नाम पुत्रों के नामों के अनुसार पड़े। इस प्रकार आग्नीध्र के सभी पुत्र पिता से प्राप्त राज्यों पर राज्य करने लगे।
 
श्लोक 22:  पूर्वचित्ति के चले जाने पर, अतृप्त वासना के कारण राजा आग्नीध्र उसी के विषय में सोचते रहते। अत: वैदिक आज्ञाओं के अनुसार राजा मृत्यु के पश्चात् उसी लोक में गये जहाँ उनकी पत्नी थी। यह लोक पितृलोक कहलाता है जहाँ कि पितरगण अत्यन्त आनन्द से रहते हैं।
 
श्लोक 23:  अपने पिता के प्रयाण के पश्चात् नवों भाइयों ने मेरु की नौ पुत्रियों के साथ विवाह कर लिया, जिनके नाम मेरुदेवी, प्रतिरूपा, उग्रदंष्ट्री, लता, रम्या, श्यामा, नारी, भद्रा तथा देववीति थे।
 
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हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥