श्रीमद् भागवतम
 
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भागवत पुराण  »  स्कन्ध 5: सृष्टि की प्रेरणा  »  अध्याय 2: महाराज आग्नीध्र का चरित्र  »  श्लोक 10
 
 
श्लोक
वाचं परं चरणपञ्जरतित्तिरीणांब्रह्मन्नरूपमुखरां श‍ृणवाम तुभ्यम् ।
लब्धा कदम्बरुचिरङ्कविटङ्कबिम्बेयस्यामलातपरिधि: क्‍व च वल्कलं ते ॥ १० ॥
 
शब्दार्थ
वाचम्—गुंजरित ध्वनि; परम्—एकमात्र; चरण-पञ्जर—नूपुरों की; तित्तिरीणाम्—तीतरों की; ब्रह्मन्—हे ब्राह्मण; अरूप— बिना रूप के; मुखराम्—स्पष्ट सुनाई पडऩे वाला; शृणवाम—मैं सुनता हूँ; तुभ्यम्—तुम्हारा; लब्धा—प्राप्त; कदम्ब—कदम्ब पुष्प सदृश; रुचि:—मनोहर रंग; अङ्क-विटङ्क-बिम्बे—सुन्दर गोल नितम्बों पर; यस्याम्—जिस पर; अलात-परिधि:—ज्वलित अंगारों का घेरा; क्व—कहाँ; च—भी; वल्कलम्—ढकने के लिए वस्त्र; ते—तुम्हारा ।.
 
अनुवाद
 
 हे ब्राह्मण, मुझे तो तुम्हारे नूपुरों की झंकार ही सुनाई पड़ती है। ऐसा लगता है उनके भीतर तीतर पक्षी चहक रहे हैं। मैं उनके रूपों को नहीं देख रहा, किन्तु मैं सुन रहा हूँ कि वे किस प्रकार चहक रहे हैं। जब मैं तुम्हारे सुन्दर गोल नितम्बों को देखता हूँ, तो मुझे लगता है कि मानो वे कदम्ब के पुष्पों का सुन्दर रंग लिए हों। तुम्हारी कमर में जाज्वल्यमान अंगारों की मेखला पड़ी हुई है। दरअसल, ऐसा लगता है कि तुम वस्त्र धारण करना भूल गये हो।
 
तात्पर्य
 पूर्वचित्ति को कामुक भाव से देखते हुए आग्नीध्र ने उस तरुणी के आकर्षक नितम्बों तथा कटि भाग पर दृष्टि फेरी। जब मनुष्य किसी स्त्री को इस प्रकार कामेच्छा से देखता है, तो वह उसके मुख, स्तन तथा कटि पर मोहित हो जाता है, क्योंकि पुरुष को अपनी वासना तृप्त करने के लिए स्त्री पहले पहल अपनी सुन्दर मुखाकृति, अपने उरोजों के उभार और कटिभाग से आकर्षित करती है। पूर्वचित्ति ने सुन्दर पीला रेशमी वस्त्र पहन रखा था, अत: उसके नितम्ब कदम्ब पुष्प के समान लग रहे थे। करधनी के कारण उसकी कमर जाज्वल्यमान अंगारों से घिरी प्रतीत हुई। यद्यपि वह वस्त्रों से पूर्णत: सज्जित थी, किन्तु आग्नीध्र इतना काममोहित हो गया था कि उसे पूछना पड़ा “तुम वस्त्ररहित होकर क्यों आई हो?”
 
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