श्रीमद् भागवतम
 
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भागवत पुराण  »  स्कन्ध 5: सृष्टि की प्रेरणा  »  अध्याय 2: महाराज आग्नीध्र का चरित्र  »  श्लोक 12
 
 
श्लोक
लोकं प्रदर्शय सुहृत्तम तावकं मेयत्रत्य इत्थमुरसावयवावपूर्वौ ।
अस्मद्विधस्य मनउन्नयनौ बिभर्तिबह्वद्भ‍ुतं सरसराससुधादि वक्त्रे ॥ १२ ॥
 
शब्दार्थ
लोकम्—आवास स्थान, देश; प्रदर्शय—दिखा दो; सुहृत्-तम—हे श्रेष्ठ मित्र, मित्रवर; तावकम्—इस प्रकार; मे—मुझको; यत्रत्य:—जिसमें उत्पन्न पुरुष; इत्थम्—इस तरह; उरसा—वक्षस्थल से; अवयवौ—दो अंग (उरोज); अपूर्वौ—अपूर्व; अस्मत्- विधस्य—मुझ जैसे व्यक्ति को; मन:-उन्नयनौ—चित्त को क्षुब्ध करने वाला; बिभर्ति—बना हुआ है; बहु—अनेक; अद्भुतम्— अद्भुत्; सरस—मृदुवचन; रास—मुस्कान जैसा हावभाव; सुधा-आदि—अमृत के तुल्य; वक्त्रे—मुख में ।.
 
अनुवाद
 
 मित्रवर, क्या तुम मुझे अपना निवास स्थान दिखा सकते हो? मैं कल्पना भी नहीं कर सकता कि उस स्थान के वासियों को तुम्हारे उन्नत उरोजों के समान अद्भुत् शारीरिक अंग किस तरह प्राप्त हुए हैं, जो मुझ जैसे देखने वाले के मन तथा नेत्रों को उद्वेलित कर रहे हैं। उनकी मधुर वाणी तथा मृदु मुस्कान से इस निर्णय पर पहुँचा हूँ कि उनके मुख में अमृत बसता होगा।
 
तात्पर्य
 प्रमत्त आग्नीध्र ने उस स्थान को भी जानना चाहा जहाँ से वह ब्राह्मण-बालक आया था और जहाँ के मनुष्यों के वक्षस्थल इस प्रकार उठे हुए थे। उन्होंने सोचा कि सम्भवत: ऐसे आकर्षक अंग उनकी कठिन तपस्या के फलस्वरूप हों। आग्नीध्र ने इस बालिका को सुहृत्तम कहकर सम्बोधित किया जिससे वह उसे वहाँ ले जाने से कहीं अस्वीकार न कर दे। आग्नीध्र न केवल उस बालिका के उन्नत उरोजों से मोहित थे, वरन् उसकी मधुरवाणी से भी आकृष्ट थे। उन्हें ऐसा प्रतीत हुआ मानो उसके मुख से अमृत निकल रहा हो। इसलिए वे अत्यन्त आश्चर्य में पड़ गये। का वात्मवृत्तिरदनाद्धविरङ्ग वाति विष्णो: कलास्यनिमिषोन्मकरौ च कर्णौ ।
 
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