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भागवत पुराण  »  स्कन्ध 5: सृष्टि की प्रेरणा  »  अध्याय 2: महाराज आग्नीध्र का चरित्र  »  श्लोक 18
 
 
श्लोक  5.2.18 
सा च ततस्तस्य वीरयूथपतेर्बुद्धिशीलरूपवय:श्रियौदार्येण पराक्षिप्तमनास्तेन सहायुतायुतपरिवत्सरोपलक्षणं कालं जम्बूद्वीपपतिना भौमस्वर्गभोगान् बुभुजे ॥ १८ ॥
 
शब्दार्थ
सा—वह स्त्री; —भी; तत:—तत्पश्चात्; तस्य—उस; वीर-यूथ-पते:—वीरों के स्वामी की; बुद्धि—बुद्धि; शील—आचरण; रूप—सुन्दरता; वय:—अवस्था (तरुण); श्रिया—ऐश्वर्य; औदार्येण—(तथा) उदारता से; पराक्षिप्त—आकर्षित; मना:—मन वाली; तेन सह—उसके साथ; अयुत—दस हजार; अयुत—दस हजार; परिवत्सर—वर्ष; उपलक्षणम्—विस्तृत; कालम्— काल, समय; जम्बूद्वीप-पतिना—जम्बूद्वीप के राजा के साथ; भौम—पृथ्वी का; स्वर्ग—स्वर्गिक; भोगान्—सुख, भोग; बुभुजे—भोग किया ।.
 
अनुवाद
 
 आग्नीघ्र की बुद्धि, तरुणाई, सौन्दर्य, आचरण, ऐश्वर्य तथा उदारता से आकर्षित होकर पूर्वचित्ति जम्बूद्वीप के राजा तथा समस्त वीरों के स्वामी आग्नीध्र के साथ कई हजार वर्षों तक रही और उसने भौतिक तथा स्वर्गिक दोनों प्रकार के सुखों का भरपूर भोग किया।
 
तात्पर्य
 ब्रह्माजी की कृपा से राजा आग्नीध्र तथा स्वर्ग-कन्या पूर्वचित्ति की युति अत्यन्त अनुकूल सिद्ध हुई। इस प्रकार उन्होंने कई हजार वर्षों तक भौतिक तथा स्वर्गिक सुखों का भोग किया।
 
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