श्रीमद् भागवतम
 
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भागवत पुराण  »  स्कन्ध 5: सृष्टि की प्रेरणा  »  अध्याय 2: महाराज आग्नीध्र का चरित्र  »  श्लोक 3
 
 
श्लोक
तदुपलभ्य भगवानादिपुरुष: सदसि गायन्तीं पूर्वचित्तिं नामाप्सरसमभियापयामास ॥ ३ ॥
 
शब्दार्थ
तत्—वह; उपलभ्य—समझकर; भगवान्—सर्वशक्तिमान; आदि-पुरुष:—इस ब्रह्माण्ड में उत्पन्न पहले जीव; सदसि—सभा में; गायन्तीम्—नर्तकी; पूर्वचित्तिम्—पूर्वचित्ति; नाम—नामक; अप्सरसम्—स्वर्ग की नर्तकी, अप्सरा को; अभियापयाम् आस— नीचे भेजा ।.
 
अनुवाद
 
 इस ब्रह्माण्ड के सर्वशक्तिमान तथा आदि पुरुष भगवान् ब्रह्मा ने राजा आग्नीध्र की अभिलाषा जानकर अपनी सभा की श्रेष्ठ अप्सरा को, जिसका नाम पूर्वचित्ति था, चुनकर राजा के पास भेजा।
 
तात्पर्य
 इस श्लोक में भगवान् आदि-पुरुष: शब्द महत्त्वपूर्ण हैं। भगवान् श्रीकृष्ण ही आदि-पुरुष हैं—गोविन्दमादिपुरुषं तमहं भजामि। भगवान् श्रीकृष्ण आदि पुरुष हैं। भगवद्गीता में अर्जुन ने उन्हें पुरुषं आद्यं कह कर सम्बोधित किया है। वे भगवान् कहे जाते हैं। किन्तु इस श्लोक में ब्रह्मा को भगवान् आदि-पुरुष: कहा गया है। भगवान् कहने का कारण यह है कि वे भगवान् का पूर्ण प्रतिनिधित्व करते हैं और इस ब्रह्माण्ड के प्रथम जीव हैं। भगवान् ब्रह्मा महाराज आग्नीध्र की अभिलाषा जान गये, क्योंकि वे भगवान् विष्णु के समान ही शक्तिमान हैं। जिस प्रकार परमात्मा पद पर स्थित भगवान् विष्णु जीवात्मा की अभिलाषा को जान लेते हैं उसी प्रकार से भगवान् ब्रह्मा भी जान लेते हैं, क्योंकि विष्णु उन्हें सूचित करने के माध्यम हैं। जैसाकि श्रीमद्भागवत (१.१.१) में कहा गया है—तेने ब्रह्म हृदा य आदिकवये—भगवान् विष्णु अपने मन की प्रत्येक बात ब्रह्मा को बता देते हैं। चूँकि महाराज आग्नीध्र ने भगवान् ब्रह्मा की विशेष आराधना की, अत: वे उन पर परम प्रसन्न हुए और उनको संतुष्ट करने के लिए उन्होंने पूर्वचित्ति अप्सरा भेज दी।
 
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हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥