श्रीमद् भागवतम
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भागवत पुराण  »  स्कन्ध 5: सृष्टि की प्रेरणा  »  अध्याय 20: ब्रह्माण्ड रचना का विश्लेषण  »  श्लोक 12

 
श्लोक
स्वगोभि: पितृदेवेभ्यो विभजन् कृष्णशुक्लयो: ।
प्रजानां सर्वासां राजान्ध: सोमो न आस्त्विति ॥ १२ ॥
 
शब्दार्थ
स्व-गोभि:—अपनी प्रकाशमय किरणों के विस्तार से; पितृ-देवेभ्य:—अपने पितरों तथा देवता-गणों को; विभजन्—विभाजित करके; कृष्ण-शुक्लयो:—कृष्ण तथा शुक्ल पक्षों में; प्रजानाम्—निवासियों का; सर्वासाम्—सभी; राजा—राजा; अन्ध:— अन्न; सोम:—चन्द्रदेव; न:—हम पर; आस्तु—अनुकूल रहे; इति—इस प्रकार ।.
 
अनुवाद
 
 [शाल्मलीद्वीप के वासी चन्द्रदेवता की आराधना निम्नलिखित शब्दों से करते हैं।] पितरों तथा देवताओं को अन्न देने के उद्देश्य से चन्द्रदेव ने अपने ही किरणों से मास को शुक्ल तथा कृष्ण नामक दो पक्षों में विभाजित किया है। चन्द्र देवता काल का विभाजन करने वाला और ब्रह्माण्ड के वासियों का अधिपति है। अत: हम यह प्रार्थना करते हैं कि वह हमारा अधिपति तथा पथप्रदर्शक बना रहे। हम उसे सादर नमस्कार करते हैं।
 
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All glories to saints and sages of the Supreme Lord
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥