श्रीमद् भागवतम
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भागवत पुराण  »  स्कन्ध 5: सृष्टि की प्रेरणा  »  अध्याय 20: ब्रह्माण्ड रचना का विश्लेषण  »  श्लोक 17

 
श्लोक
परस्य ब्रह्मण: साक्षाज्जातवेदोऽसि हव्यवाट् ।
देवानां पुरुषाङ्गानां यज्ञेन पुरुषं यजेति ॥ १७ ॥
 
शब्दार्थ
परस्य—परमेश्वर की; ब्रह्मण:—ब्रह्म का; साक्षात्—प्रकट रूप में, साक्षात्; जात-वेद:—हे अग्निदेव; असि—आप हैं; हव्यवाट्—अन्न तथा घृत की आहुति के वाहक; देवानाम्—समस्त देवताओं के; पुरुष-अङ्गानाम्—जो परम पुरुष के अंग हैं; यज्ञेन—यज्ञों के द्वारा; पुरुषम्—परम् पुरुष को; यज—यज्ञ करो; इति—इस प्रकार ।.
 
अनुवाद
 
 [यह वह मंत्र है, जिसके द्वारा कुशद्वीप के वासी अग्निदेव की पूजा करते हैं।] हे अग्निदेव, आप श्रीभगवान् हरि के अंश रूप हैं और उन तक समस्त हवियों को पहुँचाते हैं। अत: हम आपसे प्रार्थना करते कि हम देवताओं को जो भी यज्ञ-सामग्री अर्पण कर रहे हैं, उसे आप पूर्ण पुरुषोत्तम भगवान् को अर्पित करें, क्योंकि परमेश्वर ही असली भोक्ता हैं।
 
तात्पर्य
 समस्त देवता श्रीभगवान् के सेवक हैं, जो उनकी सेवा में रत रहते हैं। अत: यदि कोई व्यक्ति देवताओं की उपासना करता है, तो वे देवता परमेश्वर के सेवकों की भाँति उन तक समस्त हवियों को पहुँचाते हैं, जिस प्रकार कर-संग्राहक नागरिकों से कर वसूल कर सरकारी कोष में पहुँचाते हैं। देवता इन हवियों को स्वीकार नहीं कर सकते; वे उन्हें श्रीभगवान् तक पहुँचाने का कार्य करते हैं। जैसाकि श्रील विश्वनाथ चक्रवर्ती ठाकुर ने कहा है—यस्य प्रसादाद् भगवत्-प्रसाद:—चूँकि गुरु श्रीभगवान् का प्रतिनिधि
होता है, अत: उसे जो भी अर्पित किया जाता है उसे वह ईश्वर तक पहुँचाता है। इसी प्रकार से समस्त देवता श्रीभगवान् के आज्ञाकारी सेवकों की भाँति समस्त हवियों को उन तक पहुँचाते हैं। यदि यह समझ कर देवताओं की उपासना की जाये तो इसमें कोई हानि नहीं है, किन्तु यदि कोई यह सोचे कि देवता श्रीभगवान् के तुल्य हैं और स्वतंत्र हैं तो उसे हम हृतज्ञान अर्थात् ज्ञान की हानि (कामैस्तैस्तैर्हृज्ञाना: ) कहेंगे। अत: जो देवताओं को वास्तविक वर देनेवाला समझते हैं, वे त्रुटि करते हैं।
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All glories to saints and sages of the Supreme Lord
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥