श्रीमद् भागवतम
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भागवत पुराण  »  स्कन्ध 5: सृष्टि की प्रेरणा  »  अध्याय 20: ब्रह्माण्ड रचना का विश्लेषण  »  श्लोक 18

 
श्लोक
तथा घृतोदाद्ब‍‌हि: क्रौञ्चद्वीपो द्विगुण: स्वमानेन क्षीरोदेन परित उपक्‍ल‍ृप्तो वृतो यथा कुशद्वीपो घृतोदेन यस्मिन् क्रौञ्चो नाम पर्वतराजो द्वीपनामनिर्वर्तक आस्ते ॥ १८ ॥
 
शब्दार्थ
तथा—और उसी प्रकार; घृत-उदात्—घृत सागर से; बहि:—बाहर, परे; क्रौञ्च-द्वीप:—क्रौंच द्वीप नामक अन्य द्वीप; द्वि- गुण:—दुगुना बड़ा; स्व-मानेन—समान विस्तार का; क्षीर-उदेन—दुग्ध सगार से; परित:—चारों ओर; उपक्लृप्त:—घिरा हुआ; वृत:—घिरा; यथा—सदृश; कुश-द्वीप:—कुशद्वीप; घृत-उदेन—घृत सागर से; यस्मिन्—जिसमें; क्रौञ्च: नाम—क्रौंच नामक; पर्वत-राज:—पर्वतों का राजा; द्वीप-नाम—द्वीप का नाम; निर्वर्तक:—लिया जाता है; आस्ते—विद्यमान है ।.
 
अनुवाद
 
 घृतसागर के बाहर क्रौंचद्वीप नाम का एक अन्य द्वीप है, जिसकी चौड़ाई घृतसागर से दुगुनी अर्थात् १६,००,००० योजन (१२,८००,००० मील) है। जिस प्रकार कुशद्वीप घृतसागर से घिरा हुआ है उसी प्रकार क्रौंचद्वीप अपने ही समान चौड़ाई वाले दुग्ध-सागर (क्षीरसागर) से घिरा हुआ है। क्रौंचद्वीप में क्रौंच नामक एक विशाल पर्वत है, जिसके कारण इस द्वीप का यह नाम पड़ा।
 
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All glories to saints and sages of the Supreme Lord
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥