श्रीमद् भागवतम
शब्द आकार

भागवत पुराण  »  स्कन्ध 5: सृष्टि की प्रेरणा  »  अध्याय 20: ब्रह्माण्ड रचना का विश्लेषण  »  श्लोक 2

 
श्लोक
जम्बूद्वीपोऽयं यावत्प्रमाणविस्तारस्तावता क्षारोदधिना परिवेष्टितो यथा मेरुर्जम्ब्वाख्येन लवणोदधिरपि ततो द्विगुणविशालेन प्लक्षाख्येन परिक्षिप्तो यथा परिखा बाह्योपवनेन । प्लक्षो जम्बूप्रमाणो द्वीपाख्याकरो हिरण्मय उत्थितो यत्राग्निरुपास्ते सप्तजिह्वस्तस्याधिपति: प्रियव्रतात्मज इध्मजिह्व: स्वं द्वीपं सप्तवर्षाणि विभज्य सप्तवर्षनामभ्य आत्मजेभ्य आकलय्य स्वयमात्मयोगेनोपरराम ॥ २ ॥
 
शब्दार्थ
जम्बू-द्वीप:—जम्बू नामक द्वीप, जम्बूद्वीप; अयम्—यह; यावत्-प्रमाण-विस्तार:—इसके विस्तार के तुल्य परिमाप अर्थात् १,००,००० योजन (एक योजन आठ मील के तुल्य है); तावता—इतना; क्षार-उदधिना—खारे सागर द्वारा; परिवेष्टित:—घिरा हुआ; यथा—जिस प्रकार; मेरु:—सुमेरु पर्वत; जम्बू-आख्येन—जम्बू नामक द्वीप से; लवण-उदधि:—लवण-सागर; अपि— निश्चय ही; तत:—तत्पश्चात्; द्वि-गुण-विशालेन—दुगुना विस्तृत; प्लक्ष-आख्येन—प्लक्ष नामक द्वीप से; परिक्षिप्त:—घिरा हुआ; यथा—सदृश; परिखा—खाईं; बाह्य—बाहरी; उपवनेन—उद्यानवत् वन के द्वारा; प्लक्ष:—प्लक्ष (पाकड़) वृक्ष; जम्बू प्रमाण:—जम्बू वृक्ष जितना ऊँचा; द्वीप-आख्या-कर:—द्वीप का नाम पड़ा; हिरण्मय:—अत्यन्त तेजमय; उत्थित:—ऊपर उठा हुआ; यत्र—जहाँ; अग्नि:—अग्नि; उपास्ते—स्थित है; सप्त-जिह्व:—सात ज्वालाओं वाली; तस्य—उस द्वीप का; अधिपति:— राजा अथवा स्वामी; प्रियव्रत-आत्मज:—राजा प्रियव्रत का पुत्र; इध्म-जिह्व:—इध्मजिह्व नामक; स्वम्—निजी; द्वीपम्—द्वीप; सप्त—सात; वर्षाणि—भूभागों में; विभज्य—विभाजित होकर; सप्त-वर्ष-नामभ्य:—जिन पर सातों भूभागों के नाम रखे गये; आत्मजेभ्य:—अपने पुत्रों को; आकलय्य—भेंट, अर्पण; स्वयम्—स्वत:; आत्म-योगेन—भगवान् की भक्ति द्वारा; उपरराम— समस्त भौतिक कार्यों से अवकाश ग्रहण कर लिया ।.
 
अनुवाद
 
 जिस प्रकार सुमेरु पर्वत चारों ओर से जम्बूद्वीप द्वारा घिरा हुआ है, उसी प्रकार जम्बूद्वीप भी लवण के सागर से घिरा है। जम्बूद्वीप की चौड़ाई १,००,००० योजन (८,००,००० मील) है और लवण का सागर भी इतना ही चौड़ा है। जिस तरह कभी-कभी दुर्ग की खाई उपवन से घिरी रहती है उसी प्रकार जम्बूद्वीप को घेरने वाला लवण-सागर भी प्लक्षद्वीप से घिरा हुआ है। प्लक्षद्वीप की चौड़ाई लवण के सागर से दुगुनी अर्थात् २,००,००० योजन (१६,००,००० मील) है। प्लक्षद्वीप में स्वर्ण के समान चमकीला एक वृक्ष है जो जम्बूद्वीप स्थित जम्बूवृक्ष के बराबर ऊँचा है। इसके मूल भाग में सात ज्वालाओं वाली अग्नि है। यह वृक्ष प्लक्ष का है, अत: इस द्वीप का नाम प्लक्षद्वीप पड़ा। यह द्वीप महाराज प्रियव्रत के एक पुत्र इध्मजिह्व द्वारा शासित था। उन्होंने सातों द्वीपों के नाम अपने सात पुत्रों के नामों पर रखे और उन्हें अपने पुत्रों को देकर, सक्रिय जीवन से अवकाश प्राप्त कर वे स्वयं श्रीभगवान् की सेवा में लीन रहने लगे।
 
____________________________
 
All glories to saints and sages of the Supreme Lord
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥