श्रीमद् भागवतम
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भागवत पुराण  »  स्कन्ध 5: सृष्टि की प्रेरणा  »  अध्याय 20: ब्रह्माण्ड रचना का विश्लेषण  »  श्लोक 20

 
श्लोक
तस्मिन्नपि प्रैयव्रतो घृतपृष्ठो नामाधिपति: स्वे द्वीपे वर्षाणि सप्त विभज्य तेषु पुत्रनामसु सप्त रिक्थादान् वर्षपान्निवेश्य स्वयं भगवान् भगवत: परमकल्याणयशस आत्मभूतस्य हरेश्चरणारविन्दमुपजगाम ॥ २० ॥
 
शब्दार्थ
तस्मिन्—उस द्वीप में; अपि—भी; प्रैयव्रत:—महाराज प्रियव्रत का पुत्र; घृत-पृष्ठ:—घृतपृष्ठ; नाम—नामक; अधिपति:—स्वामी, राजा; स्वे—अपने; द्वीपे—द्वीप में; वर्षाणि—भूभाग; सप्त—सात; विभज्य—विभाजित करके; तेषु—उनमें से प्रत्येक में; पुत्र नामसु—अपने पुत्रों के नाम वाले; सप्त—सात; रिक्था-दान्—पुत्र; वर्ष-पान्—वर्षों के स्वामी; निवेश्य—नियुक्त करके; स्वयम्—स्वयं; भगवान्—अत्यन्त शक्तिमान; भगवत:—श्रीभगवान् का; परम-कल्याण-यशस:—जिसका यश परम कल्याणकारी है; आत्म-भूतस्य—समस्त आत्माओं की आत्मा; हरे: चरण-अरविन्दम्—हरि के चरणकमल में; उपजगाम— शरण ली ।.
 
अनुवाद
 
 इस द्वीप के अधिपति महाराज प्रियव्रत के अन्य पुत्र थे जिनका नाम घृतपृष्ठ था और जो अत्यन्त विद्वान थे। उन्होंने भी अपने देश को सात भागों में विभाजित करके उनके नाम अपने सातों पुत्रों के नामों के अनुसार रखे और स्वयं गृहस्थ जीवन से विरक्त होकर परम कल्याणकारी, समस्त आत्माओं की आत्मा श्रीभगवान् के पदारविन्दों में शरण ली। इस प्रकार वे सिद्धि को प्राप्त हुए।
 
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All glories to saints and sages of the Supreme Lord
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥