श्रीमद् भागवतम
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भागवत पुराण  »  स्कन्ध 5: सृष्टि की प्रेरणा  »  अध्याय 20: ब्रह्माण्ड रचना का विश्लेषण  »  श्लोक 22

 
श्लोक
यासामम्भ: पवित्रममलमुपयुञ्जाना: पुरुषऋषभद्रविणदेवकसंज्ञा वर्षपुरुषा आपोमयं देवमपां पूर्णेनाञ्जलिना यजन्ते ॥ २२ ॥
 
शब्दार्थ
यासाम्—सभी नदियों का; अम्भ:—जल; पवित्रम्—अत्यन्त पावन; अमलम्—अत्यन्त निर्मल; उपयुञ्जाना:—उपयोग करते हुए; पुरुष—पुरुष; ऋषभ—ऋषभ; द्रविण—द्रविण; देवक—देवक; संज्ञा:—नामों वाले; वर्ष-पुरुषा:—उन वर्षों के निवासी; आप:-मयम्—जल के स्वामी वरुण को; देवम्—उपास्य श्रीविग्रह के रूप में; अपाम्—जल को; पूर्णेन—पूर्ण; अञ्जलिना— अंजुली से; यजन्ते—आराधना करते हैं ।.
 
अनुवाद
 
 क्रौंच द्वीप के निवासी चार वर्णों में विभाजित हैं—पुरुष, ऋषभ, द्रविण तथा देवक। वे जल के स्वामी वरुण जिन का रूप जल के समान है के चरणारविन्दों पर इन पवित्र नदियों की जलांजलि अर्पित करके श्रीभगवान् की पूजा करते हैं।
 
तात्पर्य
 विश्वनाथ चक्रवर्ती ठाकुर कहते हैं—आपोमय: अश्मयम्—क्रौंच द्वीप के विभिन्न वर्णों के लोग बद्ध
अंजलि द्वारा पवित्र नदियों का जल प्रस्तर या लोहे के बने श्रीविग्रह पर अर्पित करते हैं।
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All glories to saints and sages of the Supreme Lord
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥