श्रीमद् भागवतम
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भागवत पुराण  »  स्कन्ध 5: सृष्टि की प्रेरणा  »  अध्याय 20: ब्रह्माण्ड रचना का विश्लेषण  »  श्लोक 23

 
श्लोक
आप: पुरुषवीर्या: स्थ पुनन्तीर्भूर्भुव:सुव: ।
ता न: पुनीतामीवघ्नी: स्पृशतामात्मना भुव इति ॥ २३ ॥
 
शब्दार्थ
आप:—हे जल; पुरुष-वीर्या:—श्रीभगवान् की शक्ति से युक्त; स्थ—आप हैं; पुनन्ती:—पवित्र करने वाले; भू:—भूव: नामक लोक; भुव:—भूव: नामक लोक; सुव:—स्व:लोक; ता:—वह जल; न:—हम सबको; पुनीत—पवित्र करता है; अमीव घ्नी:—पापों का नाश करने वाला; स्पृशताम्—स्पर्श करने वालों के; आत्मना—अपने स्वाभाविक पद के कारण; भुव:—देह; इति—इस प्रकार ।.
 
अनुवाद
 
 [क्रौंच द्वीप के निवासी इस मंत्र से उपासना करते हैं] हे नदियों के जल, आपको श्रीभगवान् से शक्ति प्राप्त है। अत: आप भूलोक, भुवर्लोक तथा स्वर्लोक को पवित्र करते हैं। अपने स्वाभाविक पद के कारण आप पापों को ग्रहण करते हैं, इसलिए हम आपका स्पर्श करते हैं। आप हमें पवित्र करते रहें।
 
तात्पर्य
 भगवद्गीता (७.४) में श्रीकृष्ण का कथन है—
भूमिरापोऽनलो वायु: खं मनो बुद्धिरेव च।

अहंकार इतीयं मे भिन्ना प्रकृतिरष्टधा ॥

“पृथ्वी, जल, अग्नि, वायु, आकाश, मन, बुद्धि और अहंकार—यह आठ प्रकार से विभाजित मेरी भिन्ना (अपरा) प्रकृति है।”

जिस प्रकार उष्मा तथा प्रकाश नामक सूर्य की शक्तियाँ इस ब्रह्माण्ड में क्रियाशील हैं और प्रत्येक वस्तु को कार्य करने के लिए प्रेरित करती हैं, उसी प्रकार परमेश्वर की शक्ति सम्पूर्ण सृष्टि में क्रियाशील रहती है। शास्त्रों में वर्णित विशिष्ट नदियाँ भी श्रीभगवान् की शक्तियाँ हैं और जो व्यक्ति इनमें प्रतिदिन स्नान करते हैं, वे पवित्र होते रहते हैं। सचमुच अनेक लोग गंगा में स्नान करने मात्र से रोगमुक्त होते हैं। इसी प्रकार क्रौंच द्वीप के निवासी नदियों में स्नान करके पवित्र होते हैं।

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All glories to saints and sages of the Supreme Lord
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥