श्रीमद् भागवतम
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भागवत पुराण  »  स्कन्ध 5: सृष्टि की प्रेरणा  »  अध्याय 20: ब्रह्माण्ड रचना का विश्लेषण  »  श्लोक 24

 
श्लोक
एवं पुरस्तात्क्षीरोदात्परित उपवेशित: शाकद्वीपो द्वात्रिंशल्लक्षयोजनायाम: समानेन च दधिमण्डोदेन परीतो यस्मिन् शाको नाम महीरुह: स्वक्षेत्रव्यपदेशको यस्य ह महासुरभिगन्धस्तं द्वीपमनुवासयति ॥ २४ ॥
 
शब्दार्थ
एवम्—इस प्रकार; पुरस्तात्—परे; क्षीर-उदात्—क्षीर सागर से; परित:—चारों ओर; उपवेशित:—स्थित; शाक-द्वीप:— शाकद्वीप नामक अन्य द्वीप; द्वा-त्रिंशत्—बत्तीस; लक्ष—लाख; योजन—योजन; आयाम:—जिसकी माप; समानेन—समान लम्बाई वाला; च—और; दधि-मण्ड-उदेन—मट्ठे के समान जल वाले समुद्र द्वारा; परीत:—आवृत; यस्मिन्—जिसमें; शाक:— शाक; नाम—नामक; महीरुह:—अंजीर का वृक्ष; स्व-क्षेत्र-व्यपदेशक:—जिससे द्वीप का यह नाम पड़ा; यस्य—जिसका; ह—निस्सन्देह; महा-सुरभि—अत्यधिक भीनी; गन्ध:—सुगन्ध; तम् द्वीपम्—उस द्वीप को; अनुवासयति—महकाती रहती है ।.
 
अनुवाद
 
 क्षीर समुद्र से बाहर शाकद्वीप है, जिसकी चौड़ाई ३२,००,००० योजन (२,५६,००,००० मील) है। जिस प्रकार क्रौंचद्वीप अपने ही क्षीरसागर से घिरा है उसी प्रकार शाकद्वीप अपने ही समान चौड़ाई वाले मट्ठे के समुद्र से घिरा है। शाकद्वीप में एक विशाल शाक वृक्ष है, जिससे इस द्वीप का यह नाम पड़ा। यह वृक्ष अत्यन्त सुगन्धित है। इससे सारा द्वीप महकता रहता है।
 
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All glories to saints and sages of the Supreme Lord
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥