श्रीमद् भागवतम
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भागवत पुराण  »  स्कन्ध 5: सृष्टि की प्रेरणा  »  अध्याय 20: ब्रह्माण्ड रचना का विश्लेषण  »  श्लोक 26

 
श्लोक
एतेषां वर्षमर्यादागिरयो नद्यश्च सप्त सप्तैव ईशान उरुश‍ृङ्गो बलभद्र: शतकेसर: सहस्रस्रोतो देवपालो महानस इति अनघाऽऽयुर्दा उभयस्पृष्टिरपराजिता पञ्चपदी सहस्रस्रुतिर्निजधृतिरिति ॥ २६ ॥
 
शब्दार्थ
एतेषाम्—इन समस्त विभागों की; वर्ष-मर्यादा—सीमा रेखा के रूप में; गिरय:—बड़ी बड़ी पहाडिय़ाँ; नद्य: च—तथा नदियाँ भी; सप्त—सात; एव—निस्सन्देह; ईशान:—ईशान; उरुशृङ्ग:—उरुशृंग; बल-भद्र:—बलभद्र; शत-केसर:—शतकेसर; सहस्र-स्रोत:—सहस्रस्रोत; देव-पाल:—देवपाल; महानस:—महानस; इति—इस प्रकार; अनघा—अनघा; आयुर्दा—आयुर्दा; उभयस्पृष्टि:—उभयस्पृष्टि; अपराजिता—अपराजिता; पञ्चपदी—पंचपदी; सहस्र-स्रुति:—सहस्र-स्रुति; निज-धृति:—निजधृति; इति—इस प्रकार ।.
 
अनुवाद
 
 इन द्वीपों में भी सात मर्यादा पर्वत तथा सात ही नदियाँ हैं। पर्वतों के नाम ईशान, उरुशृंग, बलभद्र, शतकेशर, सहस्र-स्रोत, देवपाल तथा महानस हैं तथा नदियाँ अनघा, आयुर्दा, उभयस्पृष्टि, अपराजिता, पंचपदी, सहस्रस्रुति तथा निजधृति हैं।
 
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All glories to saints and sages of the Supreme Lord
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥