श्रीमद् भागवतम
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भागवत पुराण  »  स्कन्ध 5: सृष्टि की प्रेरणा  »  अध्याय 20: ब्रह्माण्ड रचना का विश्लेषण  »  श्लोक 27

 
श्लोक
तद्वर्षपुरुषा ऋतव्रतसत्यव्रतदानव्रतानुव्रतनामानो भगवन्तं वाय्वात्मकं प्राणायामविधूतरजस्तमस: परमसमाधिना यजन्ते ॥ २७ ॥
 
शब्दार्थ
तत्-वर्ष-पुरुषा:—उस वर्ष के निवासी; ऋत-व्रत—ऋतव्रत; सत्य-व्रत—सत्यव्रत; दान-व्रत—दानव्रत; अनुव्रत—अनुव्रत; नामान:—इन (चार) नाम वाले; भगवन्तम्—श्रीभगवान्; वायु-आत्मकम्—वायु देवता के रूप में; प्राणायाम—प्राणायाम द्वारा; विधूत—निर्मल बनाया; रज:-तमस:—रजोगुण तथा तमोगुण; परम समाधिना—परम समाधि द्वारा; यजन्ते—उपासना करते हैं ।.
 
अनुवाद
 
 उन द्वीपों के वासी भी ऋतव्रत, सत्यव्रत, दानव्रत तथा अनुव्रत—इन चार वर्णों में विभक्त हैं, जो ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य तथा शूद्र के समान हैं। वे प्राणायाम तथा योग साधते हैं और समाधि द्वारा वायु रूप में परमेश्वर भगवान् की उपासना करते हैं।
 
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All glories to saints and sages of the Supreme Lord
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥