श्रीमद् भागवतम
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भागवत पुराण  »  स्कन्ध 5: सृष्टि की प्रेरणा  »  अध्याय 20: ब्रह्माण्ड रचना का विश्लेषण  »  श्लोक 28

 
श्लोक
अन्त:प्रविश्य भूतानि यो बिभर्त्यात्मकेतुभि: ।
अन्तर्यामीश्वर: साक्षात्पातु नो यद्वशे स्फुटम् ॥ २८ ॥
 
शब्दार्थ
अन्त:-प्रविश्य—अन्त:करण में प्रवेश करके; भूतानि—समस्त प्राणियों का; य:—जो; बिभर्ति—पालन करता है; आत्म- केतुभि:—अन्त: वायु की क्रियाओं (प्राण, अपान इत्यदि) द्वारा.); अन्तर्यामी—अन्तस्थ परमात्मा; ईश्वर:—परमेश्वर; साक्षात्—साक्षात्; पातु—पालन करे; न:—हमारा; यत्-वशे—जिसके वश में; स्फुटम्—विराट जगत ।.
 
अनुवाद
 
 [शाकद्वीप के निवासी वायु रूप में श्रीभगवान् की उपासना निम्नलिखित शब्दों से करते हैं] हे परम पुरुष, देह के भीतर परमात्मा रूप में स्थित आप विभिन्न वायुओं यथा प्राण की विभिन्न क्रियाओं का संचालन करने वाले तथा समस्त जीवात्माओं का पालन करने वाले हैं। हे ईश्वर, हे परमात्मा, हे विराट जगत के नियामक, आप सभी प्रकार के संकटों से हमारी रक्षा करें।
 
तात्पर्य
 योगीजन प्राणायाम नामक योगक्रिया के बल से शरीर के भीतर वायु को रोक कर शरीर को स्वस्थ रखते हैं। इस प्रकार योगी समाधि दशा को प्राप्त होते हैं और अपने हृदय-प्रदेश में श्रीभगवान् को देखने
का प्रयास करते हैं। अपने हृदय-प्रदेश में श्रीभगवान् को अन्तर्यामी रूप में देखकर उसमें तल्लीन रहने के लिए समाधि की अवस्था प्राप्त करना आवश्यक है जो प्राणायाम के माध्यम से सम्भव है।
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All glories to saints and sages of the Supreme Lord
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥