श्रीमद् भागवतम
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भागवत पुराण  »  स्कन्ध 5: सृष्टि की प्रेरणा  »  अध्याय 20: ब्रह्माण्ड रचना का विश्लेषण  »  श्लोक 29

 
श्लोक
एवमेव दधिमण्डोदात्परत: पुष्करद्वीपस्ततो द्विगुणायाम: समन्तत उपकल्पित: समानेन स्वादूदकेन समुद्रेण बहिरावृतो यस्मिन् बृहत्पुष्करं ज्वलनशिखामलकनकपत्रायुतायुतं भगवत: कमलासनस्याध्यासनं परिकल्पितम् ॥ २९ ॥
 
शब्दार्थ
एवम् एव—इस प्रकार; दधि-मण्ड-उदात्—मट्ठे के सागर से; परत:—परे; पुष्कर-द्वीप:—पुष्कर द्वीप नामक अन्य द्वीप; तत:—उस (शाकद्वीप) की अपेक्षा; द्वि-गुण-आयाम:—जिसका विस्तार दुगुना है; समन्तत:—चारों दिशाओं में; उपकल्पित:—घिरा हुआ; समानेन—समान विस्तार वाला; स्वादु-उदकेन—मधुर जल वाले; समुद्रेण—समुद्र से; बहि:—बाहर से; आवृत:—घिरा हुआ; यस्मिन्—जिसमें; बृहत्—विशाल; पुष्करम्—कमल पुष्प; ज्वलन-शिखा—प्रज्ज्वलित अग्नि की ज्वालाओं सदृश; अमल—निर्मल; कनक—स्वर्ण; पत्र—पत्तियाँ; अयुत-अयुतम्—लाखों अथवा दस करोड़; भगवत:— अत्यन्त शक्तिमान; कमल आसनस्य—ब्रह्मा का, जिनका आसन कमल है; अध्यासनम्—आसन; परिकल्पितम्—माना जाता है ।.
 
अनुवाद
 
 दधि के समुद्र से बाहर पुष्कर नाम का एक अन्य द्वीप है जो इस समुद्र से दुगनी चौड़ाई वाला अर्थात् ६४,००,००० योजन (५,२२,००,००० मील) है। यह द्वीप अपने ही समान चौड़ाई वाले मधुर जल के सागर से घिरा हुआ है। पुष्कर द्वीप में अग्नि की ज्वालाओं के समान देदीप्यमान दस करोड़ स्वर्णिम पंखुडिय़ों वाला विशाल कमल का पुष्प है, जो सर्वशक्तिमान तथा इसी कारण कभी कभी भगवान् कहलाने वाले ब्रह्मा का आसन माना जाता है।
 
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All glories to saints and sages of the Supreme Lord
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥