श्रीमद् भागवतम
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भागवत पुराण  »  स्कन्ध 5: सृष्टि की प्रेरणा  »  अध्याय 20: ब्रह्माण्ड रचना का विश्लेषण  »  श्लोक 30

 
श्लोक
तद्‌द्वीपमध्ये मानसोत्तरनामैक एवार्वाचीनपराचीनवर्षयोर्मर्यादाचलोऽयुतयोजनोच्छ्रायायामो यत्र तु चतसृषु दिक्षु चत्वारि पुराणि लोकपालानामिन्द्रादीनां यदुपरिष्टात्सूर्यरथस्य मेरुं परिभ्रमत: संवत्सरात्मकं चक्रं देवानामहोरात्राभ्यां परिभ्रमति ॥ ३० ॥
 
शब्दार्थ
तत्-द्वीप-मध्ये—उस द्वीप के मध्य में; मानसोत्तर—मानसोत्तर; नाम—नामक; एक:—एक; एव—निस्सन्देह; अर्वाचीन—इस ओर; पराचीन—उस ओर; वर्षयो:—वर्षों (भूभागों) के; मर्यादा—सीमा सूचक; अचल:—पर्वत; अयुत—दस हजार; योजन—आठ मील तुल्य दूरी; उच्छ्राय-आयाम:—जिसकी ऊँचाई तथा चौड़ाई; यत्र—जहाँ; तु—लेकिन; चतसृषु—चारों; दिक्षु—दिशाओं में; चत्वारि—चार; पुराणि—नगर; लोक-पालानाम्—लोकों के पालकों का; इन्द्र-आदीनाम्—इंद्र आदि; यत्—जिसका; उपरिष्टात्—ऊपर; सूर्य-रथस्य—सूर्य देव के रथ का; मेरुम्—मेरु पर्वत; परिभ्रमत:—परिक्रमा करते हुए; संवत्सर-आत्मकम्—एक संवत्सर वाला; चक्रम्—चक्र; देवानाम्—देवताओं का; अह:-रात्राभ्याम्—दिन तथा रात्रि से; परिभ्रमति—चक्कर लगाता है ।.
 
अनुवाद
 
 उस द्वीप के बीचोंबीच, भीतरी तथा बाहरी ओर की सीमा बनाने वाला मानसोत्तर नाम का एक पर्वत है। यह दस हजार योजन (८०,००० मील) ऊँचा और इतना ही चौड़ा है इसके ऊपर चारों दिशाओं में इन्द्रादि लोकपालों की पुरियाँ हैं। सूर्यदेव अपने रथ में आरूढ़ होकर इस पर्वत के ऊपर संवस्तर नामक परिधि में, जो मेरु पर्वत का चक्कर लगाती है, यात्रा करते हैं। उत्तर दिशा में सूर्य का पथ उत्तरायण और दक्षिण दिशा में दक्षिणायन कहलाता है। देवताओं के लिए एक दिशा में दिन होता है, तो दूसरी में रात्रि।
 
तात्पर्य
 सूर्य की गति की पुष्टि ब्रह्म-संहिता (५.५२) से भी होती है—यस्याज्ञया भ्रमति सम्भृत- कालचक्र:। सूर्य छ: मास तक सुमेरु पर्वत
की उत्तर दिशा में और छ: मास तक दक्षिण दिशा में चक्कर लगाता है। स्वर्गलोक के देवताओं के दिन और रात्रि की यही अवधियाँ हैं।
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All glories to saints and sages of the Supreme Lord
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥