श्रीमद् भागवतम
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भागवत पुराण  »  स्कन्ध 5: सृष्टि की प्रेरणा  »  अध्याय 20: ब्रह्माण्ड रचना का विश्लेषण  »  श्लोक 31

 
श्लोक
तद्‌द्वीपस्याप्यधिपति: प्रैयव्रतो वीतिहोत्रो नामैतस्यात्मजौ रमणकधातकिनामानौ वर्षपती नियुज्य स स्वयं पूर्वजवद्भ‍गवत्कर्मशील एवास्ते ॥ ३१ ॥
 
शब्दार्थ
तत्-द्वीपस्य—उस द्वीप का; अपि—भी; अधिपति:—राजा; प्रैयव्रत:—महाराज प्रियव्रत का पुत्र; वीतिहोत्र: नाम—वीतिहोत्र नामक; एतस्य—उसके; आत्म-जौ—अपने दो पुत्रों को; रमणक—रमणक; धातकि—तथा धातकि; नामानौ—नाम वाले; वर्ष-पती—दोनों वर्षों के स्वामी; नियुज्य—नियुक्त करके; स: स्वयम्—वह स्वयं; पूर्वज-वत्—अपने अन्य भाइयों के समान; भगवत्-कर्म-शील:—श्रीभगवान् को प्रसन्न करने में लीन; एव—निस्सन्देह; आस्ते—लगा रहता है ।.
 
अनुवाद
 
 इस द्वीप का अधिपति महाराज प्रियव्रत का पुत्र वीतिहोत्र था जिसके रमणक तथा धातकी नामक दो पुत्र हुए। उसने इन दोनों पुत्रों को इस द्वीप के दोनों छोर दे दिये और स्वयं अपने अग्रज मेधातिथि के समान श्रीभगवान् की सेवा में तत्पर रहने लगा।
 
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All glories to saints and sages of the Supreme Lord
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥