श्रीमद् भागवतम
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भागवत पुराण  »  स्कन्ध 5: सृष्टि की प्रेरणा  »  अध्याय 20: ब्रह्माण्ड रचना का विश्लेषण  »  श्लोक 32

 
श्लोक
तद्वर्षपुरुषा भगवन्तं ब्रह्मरूपिणं सकर्मकेण कर्मणाऽऽराधयन्तीदं चोदाहरन्ति ॥ ३२ ॥
 
शब्दार्थ
तत्-वर्ष-पुरुषा:—उस द्वीप के वासी; भगवन्तम्—श्रीभगवान्; ब्रह्म-रूपिणम्—कमलासीन भगवान् ब्रह्मा के रूप में; स- कर्मकेण—भौतिक कामनाओं की पूर्ति हेतु; कर्मणा—वेदविहित अनुष्ठान करके; आराधयन्ति—आराधना करते हैं; इदम्— यह; च—तथा; उदाहरन्ति—जप करते हैं ।.
 
अनुवाद
 
 इस द्वीप के वासी अपनी भौतिक कामनाओं की पूर्ति के लिए ब्रह्मा के रूप में श्रीभगवान् की आराधना करते हैं। वे इस प्रकार उनकी स्तुति करते हैं।
 
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All glories to saints and sages of the Supreme Lord
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥