श्रीमद् भागवतम
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भागवत पुराण  »  स्कन्ध 5: सृष्टि की प्रेरणा  »  अध्याय 20: ब्रह्माण्ड रचना का विश्लेषण  »  श्लोक 33

 
श्लोक
यत्तत्कर्ममयं लिङ्गं ब्रह्मलिङ्गं जनोऽर्चयेत् ।
एकान्तमद्वयं शान्तं तस्मै भगवते नम इति ॥ ३३ ॥
 
शब्दार्थ
यत्—जो; तत्—वह; कर्म-मयम्—वैदिक कृत्यों के द्वारा प्राप्य; लिङ्गम्—स्वरूप को; ब्रह्म-लिङ्गम्—जिससे परब्रह्म जाने जाते हैं; जन:—व्यक्ति; अर्चयेत्—अर्चना करनी चाहिए; एकान्तम्—एक परम ब्रह्म में पूर्ण आस्था रखने वाला; अद्वयम्—अभिन्न; शान्तम्—शान्त; तस्मै—उन; भगवते—सर्वशक्तिमान को; नम:—नमस्कार है; इति—इस प्रकार ।.
 
अनुवाद
 
 भगवान् ब्रह्मा कर्ममय कहलाते हैं, क्योंकि अनुष्ठानों को करके कोई भी उनका पद प्राप्त कर सकता है और उन्हीं से वैदिक अनुष्ठान-स्तुतियाँ प्रकट होती हैं। वे अविचल भाव से श्रीभगवान् की भक्ति करते हैं, अत: एक प्रकार से वे भगवान् से अभिन्न हैं। फिर भी उनकी उपासना एकान्तिक भाव से न करके द्वैत भाव से करनी चाहिए। मनुष्य को चाहिए कि अपने को दास मानते हुए पर-ब्रह्म को ही परम आराध्य माने। अत: हम भगवान् ब्रह्मा को साक्षात् वेदज्ञान के रूप में नमस्कार करते हैं।
 
तात्पर्य
 इस श्लोक में आगत कर्म-मयम् शब्द महत्त्वपूर्ण है। वेदों का वचन है—स्वधर्म-निष्ठ: शतजन्मभि: पुमान् विरिञ्चताम् एति—जो एक सौ जन्मों तक वर्णाश्रम धर्म के नियमों का कठोरता से पालन करता है उसे ब्रह्मा-पद की प्राप्ति होती है। यद्यपि भगवान् ब्रह्मा अत्यन्त शक्तिमान हैं, किन्तु वे कभी भी अपने को पूर्ण पुरुषोत्तम भगवान् से अभिन्न नहीं मानते, क्योंकि उन्हें यह ज्ञात है कि वे ईश्वर
के शाश्वत दास हैं। चूँकि आध्यात्मिक स्तर पर अभिन्न रूप से भगवान् तथा दास एक हैं, इसीलिए ब्रह्मा को यहाँ भगवान् कहा गया है। भगवान् तो पूर्ण पुरुषोत्तम भगवान् श्रीकृष्ण हैं, किन्तु यदि कोई भक्त परम आस्था से उनकी सेवा करता है, तो वैदिक साहित्य का उसे ज्ञान हो जाता है। इसीलिए ब्रह्मा को ब्रह्मलिंग कहा जाता है, जिससे यह बोध होता है कि उनका सम्पूर्ण स्वरूप वैदिक ज्ञानमय है।
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All glories to saints and sages of the Supreme Lord
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥