श्रीमद् भागवतम
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भागवत पुराण  »  स्कन्ध 5: सृष्टि की प्रेरणा  »  अध्याय 20: ब्रह्माण्ड रचना का विश्लेषण  »  श्लोक 34

 
श्लोक
ऋषिरुवाच
तत: परस्ताल्लोकालोकनामाचलो लोकालोकयोरन्तराले परित उपक्षिप्त: ॥ ३४ ॥
 
शब्दार्थ
तत:—मधुर जल के सागर से; परस्तात्—परे, आगे; लोकालोक-नाम—लोकालोक नामक; अचल:—पर्वत; लोक- अलोकयो: अन्तराले—प्रकाश तथा अंधकार से पूर्ण देशों के मध्य में; परित:—चारों ओर; उपक्षिप्त:—विद्यमान है ।.
 
अनुवाद
 
 इसके पश्चात् मृदुल जल वाले सागर के आगे तथा इसको पूरी तरह घेरने वाला लोकालोक नामक पर्वत है जो देशों को सूर्य से प्रकाशित तथा अप्रकाशित इन दो भागों में विभाजित कर देता है।
 
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All glories to saints and sages of the Supreme Lord
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥