श्रीमद् भागवतम
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भागवत पुराण  »  स्कन्ध 5: सृष्टि की प्रेरणा  »  अध्याय 20: ब्रह्माण्ड रचना का विश्लेषण  »  श्लोक 36

 
श्लोक
लोकालोक इति समाख्या यदनेनाचलेन लोकालोकस्यान्तर्वर्तिनावस्थाप्यते ॥ ३६ ॥
 
शब्दार्थ
लोक—प्रकाश(अथवा वासियों) से; अलोक:—प्रकाशरहित (अथवा वासियों से विहीन); इति—इस प्रकार से; समाख्या— पद; यत्—जो; अनेन—इस; अचलेन—पर्वत से; लोक—जीवात्माओं के देश; अलोकस्य—बिना प्राणियों वाले देश का; अन्तर्वर्तिना—मध्य में स्थित; अवस्थाप्यते—स्थित है ।.
 
अनुवाद
 
 जीवात्माओं से युक्त तथा बिना प्राणियों वाले देशों के मध्य में एक विशाल पर्वत है जो इन दोनों को पृथक् करता हैं, अत: लोकालोक नाम से विख्यात है।
 
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All glories to saints and sages of the Supreme Lord
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥