श्रीमद् भागवतम
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भागवत पुराण  »  स्कन्ध 5: सृष्टि की प्रेरणा  »  अध्याय 20: ब्रह्माण्ड रचना का विश्लेषण  »  श्लोक 37

 
श्लोक
स लोकत्रयान्ते परित ईश्वरेण विहितो यस्मात्सूर्यादीनां ध्रुवापवर्गाणां ज्योतिर्गणानां गभस्तयोऽर्वाचीनांस्त्रींल्लोकानावितन्वाना न कदाचित्पराचीना भवितुमुत्सहन्ते तावदुन्नहनायाम: ॥ ३७ ॥
 
शब्दार्थ
स:—वह पर्वत; लोक-त्रय-अन्ते—तीनों लोकों (भूर्लोक, भुवर्लोक तथा स्वर्लोक) के अन्त में; परित:—चारों ओर; ईश्वरेण—भगवान् श्रीकृष्ण द्वारा; विहित:—सृष्टि की; यस्मात्—जिससे; सूर्य-आदीनाम्—सूर्यलोक का; ध्रुव-अपवर्गाणाम्— ध्रुव तथा अन्य निम्नतर नक्षत्रों तक; ज्योति:-गणानाम्—समस्त नक्षत्रों का; गभस्तय:—किरणें; अर्वाचीनान्—इस दिशा में; त्रीन्—तीन; लोकान्—लोक; आवितन्वाना:—विस्तीर्ण; न—नहीं; कदाचित्—किसी समय; पराचीना:—उस पर्वत की सीमा के परे; भवितुम्—होने के लिए; उत्सहन्ते—समर्थ हैं; तावत्—उतना; उन्नहन-आयाम:—पर्वत की ऊँचाई की माप ।.
 
अनुवाद
 
 श्रीकृष्ण की परमेच्छा से लोकालोक नामक पर्वत तीनों लोकों—भूर्लोक, भूवर्लोक तथा स्वर्लोक—की बाहरी सीमा के रूप में स्थापित किया गया है, जिससे सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड में सूर्य की किरणों का नियंत्रण किया जा सके। सूर्य से लेकर ध्रुवलोक एवं सारे नक्षत्र इन तीनों लोकों में इस पर्वत के द्वारा निर्मित सीमा के अन्तर्गत अपनी किरणें बिखेरते हैं। चूँकि यह पर्वत ध्रुवलोक से भी ऊँचा है, अत: यह नक्षत्रों की किरणों को अवरुद्ध कर लेता है, जिससे वे कभी भी इसके बाहर प्रसारित नहीं हो पातीं।
 
तात्पर्य
 लोकत्रय से हमारा प्रयोजन उन तीन लोकों—भू:, भुव: तथा स्व:—से है जिनमें यह ब्रह्माण्ड विभक्त है। इन लोकों को घेरने वाली आठ दिशाएँ हैं, जिनके नाम हैं-पूर्व, पश्चिम, उत्तर, दक्षिण, उत्तर-पूर्व, दक्षिण-पूर्व, उत्तर-पश्चिम तथा दक्षिण-पश्चिम। लोकालोक पर्वत की स्थापना समस्त लोकों की बाह्य सीमा में इसलिए की गई, जिससे सूर्य तथा अन्य नक्षत्रों की किरणें समस्त ब्रह्माण्ड में समान रूप से वितरित हों।
सूर्य की किरणें ब्रह्माण्ड के विभिन्न लोकों में जिस प्रकार वितरित होती हैं, इसका यह वर्णन अत्यन्त वैज्ञानिक है। शुकदेव गोस्वामी ने महाराज परीक्षित को यह विश्वविवरण जैसा अपने पूर्वजों से सुना था कह सुनाया। उन्होंने इन तथ्यों को पाँच हजार वर्ष पूर्व कह सुनाया था, किन्तु यह ज्ञान बहुत काल पहले से उपलब्ध था और श्रीशुकदेव गोस्वामी ने इसे शिष्य परम्परा से प्राप्त किया। परम्परा से प्राप्त होने से यह ज्ञान पूर्ण है। इसके विपरीत आधुनिक विज्ञान का इतिहास कुछ सौ वर्षों से अधिक पुराना नहीं है। अत: यदि आधुनिक विज्ञानी श्रीमद्भागवत के अन्य तथ्यों को न भी स्वीकार करें तो भी वे दीर्घकाल से चली आने वाली नक्षत्रविज्ञान सम्बन्धी पूर्ण गणनाओं को कैसे अस्वीकार कर सकते हैं? श्रीमद्भागवत से अथाह सूचनाएँ प्राप्त की जा सकती है। किन्तु आधुनिक विज्ञानियों को अन्य लोकों के सम्बन्ध में कोई जानकारी नहीं है और वास्तविकता तो यह है कि जिस लोक में हम रह रहे हैं उससे भी वे ठीक से परिचित नहीं हो पाये हैं।
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All glories to saints and sages of the Supreme Lord
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥