श्रीमद् भागवतम
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भागवत पुराण  »  स्कन्ध 5: सृष्टि की प्रेरणा  »  अध्याय 20: ब्रह्माण्ड रचना का विश्लेषण  »  श्लोक 38

 
श्लोक
एतावाँल्लोकविन्यासो मानलक्षणसंस्थाभिर्विचिन्तित: कविभि: स तु पञ्चाशत्कोटिगणितस्य भूगोलस्य तुरीयभागोऽयं लोकालोकाचल: ॥ ३८ ॥
 
शब्दार्थ
एतावान्—इतना; लोक-विन्यास:—विभिन्न लोकों का वितरण; मान—परिमाप; लक्षण—लक्षण, चिह्न; संस्थाभि:—तथा उनकी विभिन्न स्थितियाँ; विचिन्तित:—वैज्ञानिक गणनाओं द्वारा निश्चित की गई; कविभि:—विद्वानों के द्वारा; स:—वह; तु— लेकिन; पञ्चाशत्-कोटि—पचास करोड़ योजन; गणितस्य—गणना करने पर; भू-गोलस्य—भूगोलक नामक लोक का; तुरीय-भाग:—चतुर्थांश; अयम्—यह; लोकालोक-अचल:—लोकालोक नामक पर्वत ।.
 
अनुवाद
 
 त्रुटि, भ्रम तथा वंचना से मुक्त विद्वानों ने प्रमाण, लक्षण और स्थिति के अनुसार लोकों का इतना ही विस्तार बतलाया है। उन्होंने विचार-विमर्श के बाद यह स्थापना की है कि सुमेरु तथा लोकालोक पर्वत की दूरी ब्रह्माण्ड के व्यास की चतुर्थांश अर्थात् १२,५०,००० (साढ़े बारह करोड़) योजन (एक अरब मील) है।
 
तात्पर्य
 श्रील विश्वनाथ चक्रवर्ती ठाकुर ने लोकालोक पर्वत की स्थिति, सूर्य गोलक की गतियों तथा सूर्य एवं ब्रह्माण्ड की परिधि के बीच की दूरी के सम्बन्ध में सही-सही ज्योतिषीय वैज्ञानिक जानकारी प्रस्तुत की है। किन्तु ज्योतिर्वेद द्वारा इन गणनाओं में प्रयुक्त पारिभाषिक शब्दों का अंग्रेजी में अनुवाद कर पाना कठिन है। अत: पाठकों को सन्तुष्ट करने के लिए हम श्रील विश्वनाथ चक्रवर्ती ठाकुर द्वारा संस्कृत में दिए गये कथन को यथावत् उद्धृत कर रहे हैं—
स तु लोकालोकस्तु भूगोलकस्य भूसम्बन्धाण्डगोलकस्येत्यर्थ:। सूर्यस्य एव भुवोऽप्य- ण्डगोलकयोर्मध्यवर्तित्वात् खगोलमिव भूगोलमपि पंचाशत्कोटियोजनप्रमाणं तस्य तुरीयभाग: सार्धद्वादशकोटियोजनविस्तारोच्छ्राय इत्यर्थ: भूस्तु चतुस्त्रिंशल्लक्षोनपञ्चाशतकोटिप्रमाणा ज्ञेया। यथा मेरुमध्यान्मानसोत्तरमध्यपर्यन्तं सार्द्धसप्तपञ्चाशल्लक्षोत्तरकोटियोजनप्रमाणम्। मानसोत्तरमध्यात्स्वादूदकसमुद्रपर्यन्तं षण्णवतिलक्षयोजनप्रमाणं तत: काञ्चनीभूमि: सार्धसप्तपञ्चाशल्लक्षोत्तरकोटियोजनप्रमाणा एवमेकतो मेरुलोकालोकयोरन्तरालमेकादशशल्लक्षाधिकचतुष्कोटिपरिमितमन्यतोऽपि तथत्येतो लोकालोकाल्लोकपर्यन्तं स्थानं द्वाविंशतिलक्षोत्तराष्टकोटिपरिमितं लोकालोकाद्बहिरप्येकत: एतावदेव अन्यतोऽप्येतावदेव यद्वक्ष्यते, योऽन्तर्विस्तार एतेन ह्यलोकपरिमाणं च व्याख्यातं यद्बर्हिर्लोकालोकाचलादित्येकतो लोकालोक: सार्धद्वादशकोटियोजपरिमाणत: अन्यतोऽपि स तथेत्येवं चतुस्रिंशल्लक्षोनपञ्चाशत्कोटिप्रमाणा भू: साब्धिद्वीपपर्वता ज्ञेया। अतएवाण्डगोलकात् सर्वतो दिक्षु सप्तदशलक्षयोजनावकाशे वर्तमाने सति पृथिव्या: शेषनागेन धारणं दिग्गजैश्च निश्चलीकरणं सार्थकं भवेदन्यथा तु व्याख्यान्तरे पञ्चाशतकोटिप्रमाणत्वाद् अण्डगोलकलग्नत्वे तत् तत् सर्वम् अकिंचित्करं स्यात् चाक्षुषे मन्वन्तरे चाकस्मात् मज्जनं श्रीवराहदेवेनोत्थापनं च दुर्घटं स्यादित्यधिकं विवेचनीयम्।
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All glories to saints and sages of the Supreme Lord
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥