श्रीमद् भागवतम
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भागवत पुराण  »  स्कन्ध 5: सृष्टि की प्रेरणा  »  अध्याय 20: ब्रह्माण्ड रचना का विश्लेषण  »  श्लोक 39

 
श्लोक
तदुपरिष्टाच्चतसृष्वाशास्वात्मयोनिनाखिलजगद्गुरुणाधिनिवेशिता ये द्विरदपतय ऋषभ: पुष्करचूडो वामनोऽपराजित इति सकललोकस्थितिहेतव: ॥ ३९ ॥
 
शब्दार्थ
तत्-उपरिष्टात्—लोकालोक पर्वत की चोटी पर; चतसृषु आशासु—चारों दिशाओं में; आत्म-योनिना—भगवान् ब्रह्मा द्वारा; अखिल-जगत्-गुरुणा—समस्त ब्रह्माण्ड के गुरु; अधिनिवेशिता:—स्थापित; ये—वे सब; द्विरद-पतय:—हाथियों में श्रेष्ठ; ऋषभ:—ऋषभ; पुष्कर-चूड:—पुष्करचूड; वामन:—वामन; अपराजित:—अपराजित; इति—इस प्रकार; सकल-लोक- स्थिति-हेतव:—विश्व के अन्तर्गत विभिन्न लोकों के पालन के कारण ।.
 
अनुवाद
 
 लोकालोक पर्वत के ऊपर सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड के परम-गुरु भगवान् ब्रह्मा के द्वारा स्थापित गजों में श्रेष्ठ चार गज-पति हैं। इन गजों के नाम हैं-ऋषभ, पुष्करचूड़, वामन तथा अपराजित। ये ब्रह्माण्ड के लोकों को धारण करते हैं।
 
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All glories to saints and sages of the Supreme Lord
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥