श्रीमद् भागवतम
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भागवत पुराण  »  स्कन्ध 5: सृष्टि की प्रेरणा  »  अध्याय 20: ब्रह्माण्ड रचना का विश्लेषण  »  श्लोक 40

 
श्लोक
तेषां स्वविभूतीनां लोकपालानां च विविधवीर्योपबृंहणाय भगवान् परममहापुरुषो महाविभूतिपतिरन्तर्याम्यात्मनो विशुद्धसत्त्वं धर्मज्ञानवैराग्यैश्वर्याद्यष्टमहासिद्ध्युपलक्षणं विष्वक्सेनादिभि: स्वपार्षदप्रवरै: परिवारितो निजवरायुधोपशोभितैर्निजभुजदण्डै: सन्धारय-माणस्तस्मिन् गिरिवरे समन्तात्सकललोकस्वस्तय आस्ते ॥ ४० ॥
 
शब्दार्थ
तेषाम्—उनमें से; स्व-विभूतीनाम्—जो उनके व्यक्तिगत अंश-विस्तार तथा सेवक हैं; लोक-पालानाम्—जिन पर विश्व के कार्य व्यापारों की देख-रेख का भार है; च—तथा; विविध—नाना प्रकार; वीर्य-उपबृंहणाय—शक्तियों के प्रसार हेतु; भगवान्— श्रीभगवान्; परम-महा-पुरुष:—सभी प्रकार के ऐश्वर्य के आद्य स्वामी, श्रीभगवान्; महा-विभूति-पति:—समस्त अकल्पनीय शक्तियों के स्वामी; अन्तर्यामी—परमात्मा; आत्मन:—अपना; विशुद्ध-सत्त्वम्—प्रकृति के गुणों से निष्कलुष अस्तित्त्व वाला; धर्म-ज्ञान-वैराग्य—धर्म, ज्ञान तथा वैराग्य का; ऐश्वर्य-आदि—समस्त प्रकार के ऐश्वर्य का; अष्ट—आठ; महा-सिद्धि—तथा महान् सिद्धियाँ; उपलक्षणम्—गुणमय; विष्वक्सेन-आदिभि:—विष्वक्सेन आदि अपने अंश-विस्तार द्वारा; स्व-पार्षद-प्रवरै:— अपने श्रेष्ठ सहायकों से; परिवारित:—घिरे हुए; निज—अपना; वर-आयुध—विभिन्न प्रकार के शस्त्र-अस्त्रों द्वारा; उपशोभितै:—सुशोभित; निज—निजी; भुज-दण्डै:—भुजदण्ड द्वारा; सन्धारयमाण:—इस रूप को प्रकट करके; तस्मिन्—उस समस्त लोकों के कल्याण हेतु; गिरि-वरे—महान् पर्वत; समन्तात्—चारों ओर; सकल-लोक-स्वस्तये—सारे लोकों के लाभ हेतु; आस्ते—है ।.
 
अनुवाद
 
 पूर्ण पुरुषोत्तम भगवान् समस्त दिव्य ऐश्वर्य तथा चिदाकाश के स्वामी हैं। वे परम पुरुष हैं अर्थात् भगवान् हैं, वे प्रत्येक प्राणी के परमात्मा हैं। स्वर्ग लोक के राजा इन्द्र के अधीन देवतागण इस भौतिक जगत के कार्यों का निरीक्षण करते हैं। विभिन्न लोकों के प्राणियों के लाभ हेतु तथा उन हाथियों तथा देवताओं की शक्ति को बढ़ाने के लिए भगवान् स्वयं उस पर्वत की चोटी पर प्रकृति के गुणों से अदूषित दिव्य शरीर धारण करके प्रकट होते हैं। अपने निजी प्रकाश तथा विष्वक्सेन जैसे सहायकों से घिरे रह कर वे अपने पूर्ण ऐश्वर्य (यथा ज्ञान तथा धर्म) एवं अपनी शक्तियों (यथा अणिमा, लघिमा तथा महिमा) को प्रदर्शित करते हैं। वे सुअलंकृत हैं और अपनी चारों भुजाओं में विविध आयुध धारण किये हुए हैं।
 
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All glories to saints and sages of the Supreme Lord
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥