श्रीमद् भागवतम
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भागवत पुराण  »  स्कन्ध 5: सृष्टि की प्रेरणा  »  अध्याय 20: ब्रह्माण्ड रचना का विश्लेषण  »  श्लोक 41

 
श्लोक
आकल्पमेवं वेषं गत एष भगवानात्मयोगमायया विरचितविविधलोकयात्रागोपीयायेत्यर्थ: ॥ ४१ ॥
 
शब्दार्थ
आ-कल्पम्—कल्प के अन्त तक; एवम्—इस प्रकार; वेषम्—वेश; गत:—स्वीकार किया; एष:—यह; भगवान्— श्रीभगवान्; आत्म-योग-मायया—अपनी योगमाया से; विरचित—सम्पन्न; विविध-लोक-यात्रा—विभिन्न लोकों का जीवनयापन; गोपीयाय—पालन करने भर को; इति—इस प्रकार; अर्थ:—प्रयोजन ।.
 
अनुवाद
 
 पूर्ण पुरुषोत्तम भगवान् के विविध रूप, यथा नारायण तथा विष्णु, विभिन्न आयुधों से अलंकृत हैं। श्रीभगवान् अपनी योगमाया से उत्पन्न समस्त लोकों का पालन करने के लिए इन रूपों को प्रकट करते हैं।
 
तात्पर्य
 भगवद्गीता (४.६) में भगवान् श्रीकृष्ण का वचन है—सम्भवाम्यात्ममायया—मैं अपनी आन्तरिक शक्ति से प्रकट होता हूँ। आत्ममाया शब्द से ईश्वर की अपनी शक्ति योगमाया का बोध होता है। अपनी योगमाया से भौतिक तथा वैकुण्ठ
जगत दोनों की सृष्टि करने के पश्चात् वे विष्णु तथा देवताओं के विभिन्न रूपों में विस्तारित होकर इसका पालन करते हैं। वे भौतिक सृष्टि का आरम्भ से अन्त तक पालन करते हैं और दिव्य लोक का वे स्वयं पालन करते हैं।
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All glories to saints and sages of the Supreme Lord
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥