श्रीमद् भागवतम
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भागवत पुराण  »  स्कन्ध 5: सृष्टि की प्रेरणा  »  अध्याय 20: ब्रह्माण्ड रचना का विश्लेषण  »  श्लोक 44

 
श्लोक
मृतेऽण्ड एष एतस्मिन् यदभूत्ततो मार्तण्ड इति व्यपदेश: ।
हिरण्यगर्भ इति यद्धिरण्याण्डसमुद्भ‍व: ॥ ४४ ॥
 
शब्दार्थ
मृते—मृत; अण्डे—गोलक में; एष:—यह; एतस्मिन्—इसमें; यत्—जो; अभूत्—सृष्टि के समय स्वयं प्रविष्ट हुआ; तत:— उससे; मार्तण्ड—मार्तण्ड; इति—इस प्रकार; व्यपदेश:—नाम; हिरण्य-गर्भ:—हिरण्यगर्भ नाम से विख्यात; इति—इस प्रकार; यत्—क्योंकि; हिरण्य-अण्ड-समुद्भव:—उनकी देह हिरण्यगर्भ से उत्पन्न हुई ।.
 
अनुवाद
 
 सूर्यदेव वैराज अर्थात् समस्त जीवात्माओं के लिए सम्पूर्ण भौतिक शरीर भी कहलाते हैं। ब्रह्माण्ड की सृष्टि के समय ब्रह्माण्ड के अण्डे के भीतर प्रवेश करने के कारण वे मार्तण्ड भी कहलाते हैं। हिरण्यगर्भ (ब्रह्मा) से भौतिक शरीर प्राप्त करने के कारण वे हिरण्यगर्भ भी कहलाते हैं।
 
तात्पर्य
 ब्रह्मा का पद परम पूर्णता प्राप्त तथा आध्यात्मिकता में उन्नत जीवों के लिए है। ऐसे जीवों के अभाव में विष्णु भगवान् अपना विस्तार ब्रह्मा के रूप में करते हैं, किन्तु ऐसा विरले ही होता है। फलत: ब्रह्मा दो प्रकार के हैं—कभी वे सामान्य जीवात्मा
के रूप में रहते हैं, तो कभी श्रीभगवान् के रूप में। यहाँ पर सामान्य ब्रह्मा का उल्लेख हुआ है। ब्रह्मा चाहे जिस रूप में हों वे वैराज ब्रह्मा तथा हिरण्यगर्भ ब्रह्मा कहे जाते हैं। इसीलिए सूर्यदेव को भी वैराज ब्रह्मा के रूप में माना गया है।
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All glories to saints and sages of the Supreme Lord
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥