श्रीमद् भागवतम
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भागवत पुराण  »  स्कन्ध 5: सृष्टि की प्रेरणा  »  अध्याय 20: ब्रह्माण्ड रचना का विश्लेषण  »  श्लोक 8

 
श्लोक
यत्र ह वै शाल्मली प्लक्षायामा यस्यां वाव किल निलयमाहुर्भगवतश्छन्द: स्तुत: पतत्‍त्रिराजस्य सा द्वीपहूतये उपलक्ष्यते ॥ ८ ॥
 
शब्दार्थ
यत्र—जहाँ; ह वै—निश्चय ही; शाल्मली—शाल्मली वृक्ष; प्लक्ष-आयामा—प्लक्ष वृक्ष जितना बड़ा (१०० योजन चौड़ा तथा ११०० योजन ऊँचा); यस्याम्—जिसमें; वाव किल—निस्सन्देह; निलयम्—निवासस्थान; आहु:—ऐसा कहते हैं; भगवत:— सर्वशक्तिमान का; छन्द:-स्तुत:—जो वैदिक स्तुतियों द्वारा ईश्वर की उपासना करता है; पतत्त्रि-राजस्य—भगवान् विष्णु का वाहन पक्षिराज गरुड़; सा—वह वृक्ष; द्वीप-हूतये—द्वीप के नाम हेतु; उपलक्ष्यते—प्रसिद्ध है ।.
 
अनुवाद
 
 शाल्मलीद्वीप में शाल्मली का एक वृक्ष है, जिससे इस द्वीप का यह नाम पड़ा। यह प्लक्ष वृक्ष के बराबर चौड़ा और ऊँचा है, अर्थात् १०० योजन ८०० मील चौड़ा तथा ११०० योजन ८८०० मील ऊँचा है। विद्वानों का कथन है कि यह विशाल वृक्ष पक्षियों के राजा तथा विष्णु के वाहन गरुड़ का निवासस्थान है। यहाँ गरुड़ भगवान् विष्णु की वैदिक स्तुति करता है।
 
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All glories to saints and sages of the Supreme Lord
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥