श्रीमद् भागवतम
शब्द आकार

भागवत पुराण  »  स्कन्ध 5: सृष्टि की प्रेरणा  »  अध्याय 20: ब्रह्माण्ड रचना का विश्लेषण  » 

 
संक्षेप विवरण
 
 इस अध्याय में प्लक्षद्वीप से प्रारम्भ करके विभिन्न द्वीपों तथा उनको घेरने वाले समुद्रों का वर्णन है। इसके अन्तर्गत लोकालोक नामक पर्वत की स्थिति और उसके आकार-प्रकार का भी वर्णन है। प्लक्षद्वीप विस्तार में जम्बूद्वीप से दुगुना है तथा लवण सागर से घिरा है। इस द्वीप का स्वामी इध्मजिह्व है जो महाराज प्रियव्रत के पुत्रों में से है। यह द्वीप सात विभागों में बँटा है और प्रत्येक में एक पर्वत तथा एक बड़ी नदी है।
दूसरा द्वीप शाल्मलिद्वीप कहलाता है। यह सुरा के समुद्र से घिरा है और ३,२००,००० मील चौड़ा अर्थात् प्लक्षद्वीप से दुगुना है। इस द्वीप का स्वामी महाराज प्रियव्रत के पुत्रों में से एक यज्ञबाहु है। प्लक्षद्वीप के ही समान यह भी सात भागों में बँटा है, जिनमें से प्रत्येक में एक पर्वत और एक बड़ी नदी है। इस द्वीप के वासी श्रीभगवान् की पूजा चन्द्रात्मा के रूप में करते हैं।

तीसरा द्वीप घृत के सागर से घिरा है और वह भी सात भागों में विभाजित है। यह कुशद्वीप कहलाता है। इसका स्वामी महाराज प्रियव्रत का अन्य पुत्र हिरण्यरेता है। इसके वासी अग्नि रूप में श्रीभगवान् की पूजा करते हैं। इस द्वीप की चौड़ाई ६,४००,००० मील अर्थात् शाल्मलिद्वीप से दुगुनी है।

चौथा द्वीप क्रौंचद्वीप है, जो दुग्ध सागर से घिरा है। इसकी चौड़ाई १,२८,००,००० मील है और यह भी अन्यों की तरह सात भागों में विभाजित है। इसके प्रत्येक भाग में एक पर्वत तथा एक बड़ी नदी है। इस द्वीप का स्वामी महाराज प्रियव्रत का ही एक पुत्र घृतपृष्ठ है। इस द्वीप के वासी जल के रूप में श्रीभगवान् की पूजा करते हैं।

पाँचवाँ द्वीप शाकद्वीप है जो २,५६,००,००० मील चौड़ा और मट्ठे के समुद्र से घिरा है। इसका स्वामी मेधातिथि नामक महाराज प्रियव्रत का पुत्र है। यह द्वीप भी सात भागों में विभाजित है, जिसके प्रत्येक भाग में एक पर्वत तथा एक बड़ी नदी है। इसके वासी वायु रूप में श्रीभगवान् की पूजा करते हैं।

छठा द्वीप पुष्करद्वीप है जो पिछले वाले द्वीप से दुगुना चौड़ा है और निर्मल जल के समुद्र से घिरा हुआ है। इसका स्वामी वीतिहोत्र है जो महाराज प्रियव्रत का ही पुत्र है। यह द्वीप मानसोत्तर पर्वत द्वारा दो भागों में विभाजित है। इसके वासी श्रीभगवान् के ही अन्य रूप स्वयंभू ही पूजा करते हैं। इस द्वीप से भी आगे दो और द्वीप हैं जिनमें से एक सदैव सूर्य के प्रकाश से प्रकाशित रहता है और दूसरा सदैव अंधकार से पूर्ण रहता है। इन दोनों द्वीपों के मध्य लोकालोक नामक पर्वत है जो ब्रह्माण्ड के सिरे से एक अरब मील दूर है। इस पर्वत पर भगवान् नारायण अपने ऐश्वर्य का विस्तार करते हुए निवास करते हैं। लोकालोक पर्वत से आगे का भाग अलोक वर्ष कहलाता है और इसके भी आगे मुक्ति से इच्छुक पुरुषों का निवासस्थान है।

सूर्य इस ब्रह्माण्ड के मध्य में, भूर्लोक तथा भुवलोक के बीचोंबीच अन्तरिक्ष में स्थित है। सूर्य तथा अण्डगोलक अर्थात् ब्रह्माण्ड गोलक के बीच की दूरी पच्चीस कोटि योजन (दो अरब मील) है। सूर्य को मार्तण्ड कहा जाता है, क्योंकि यह ब्रह्माण्ड में प्रवेश करके आकाश को विभाजित करता है और हिरण्यगर्भ, जो महत् तत्त्व का शरीर है, से उत्पन्न होने के कारण यह हिरण्यगर्भ भी कहलाता है।

 
____________________________
 
All glories to saints and sages of the Supreme Lord
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥