श्रीमद् भागवतम
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भागवत पुराण  »  स्कन्ध 5: सृष्टि की प्रेरणा  »  अध्याय 21: सूर्य की गतियों का वर्णन  »  श्लोक 5

 
श्लोक
यदा वृश्चिकादिषु पञ्चसु वर्तते तदाहोरात्राणि विपर्ययाणि भवन्ति ॥ ५ ॥
 
शब्दार्थ
यदा—जब; वृश्चिक-आदिषु—वृश्चिक इत्यादि; पञ्चसु—पाँच; वर्तते—रहता है; तदा—उस काल; अह:-रात्राणि—दिन तथा रात; विपर्ययाणि—इसके विपरीत (दिन घटता और रात बढ़ती है); भवन्ति—होते हैं ।.
 
अनुवाद
 
 जब सूर्य वृश्चिक इत्यादि पाँच राशियों से होकर गुजरता है, तो दिन घटता है (जब तक यह मकर राशि पर नहीं आ जाता) और फिर क्रमश: मास प्रति मास बढ़ता जाता है जब तक दिन और रात समान (मेष पर) नहीं हो जाते।
 
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All glories to saints and sages of the Supreme Lord
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥