श्रीमद् भागवतम
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भागवत पुराण  »  स्कन्ध 5: सृष्टि की प्रेरणा  »  अध्याय 21: सूर्य की गतियों का वर्णन  »  श्लोक 6

 
श्लोक
यावद्दक्षिणायनमहानि वर्धन्ते यावदुदगयनं रात्रय: ॥ ६ ॥
 
शब्दार्थ
यावत्—जब तक; दक्षिण-अयनम्—सूर्य दक्षिण को चला जाता है; अहानि—दिन; वर्धन्ते—बढ़ते हैं; यावत्—जब तक; उदगयनम्—सूर्य उत्तर को जाता है (उत्तरायण); रात्रय:—रातें ।.
 
अनुवाद
 
 सूर्य के दक्षिणायन होने तक दिन बढ़ते रहते हैं और उत्तरायण होने तक रातें लम्बी होती जाती हैं।
 
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All glories to saints and sages of the Supreme Lord
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥