श्रीमद् भागवतम
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भागवत पुराण  »  स्कन्ध 5: सृष्टि की प्रेरणा  »  अध्याय 22: ग्रहों की कक्ष्याएँ  »  श्लोक 14

 
श्लोक
अत ऊर्ध्वमङ्गारकोऽपि योजनलक्षद्वितय उपलभ्यमानस्त्रिभिस्त्रिभि: पक्षैरेकैकशो राशीन्द्वादशानुभुङ्क्ते यदि न वक्रेणाभिवर्तते प्रायेणाशुभग्रहोऽघशंस: ॥ १४ ॥
 
शब्दार्थ
अत:—इससे; ऊर्ध्वम्—ऊपर; अङ्गारक:—मंगल; अपि—भी; योजन-लक्ष-द्वितये—२,००,००० योजन अर्थात् १६,००,००० मील की दूरी पर; उपलभ्यमान:—स्थित है; त्रिभि: त्रिभि:—तीन-तीन करके; पक्षै:—पक्ष; एक-एकश:—एक के पश्चात् एक; राशीन्—राशियाँ; द्वादश—बारह; अनुभुङ्क्ते—से पार करता है; यदि—यदि; न—नहीं; वक्रेण—वक्र सहित; अभिवर्तते— निकट पहुँचता है; प्रायेण—प्राय:; अशुभ-ग्रह:—प्रतिकूल, अमंगलकारी ग्रह; अघ-शंस:—कष्ट उत्पन्न करने वाला ।.
 
अनुवाद
 
 बुध से १६,००,००० मील ऊपर अथवा पृथ्वी से ८८,००,००० मील ऊपर मंगल ग्रह है। यदि यह वक्रगति से न चले तो एक-एक राशि को तीन-तीन पक्षों में पार करता हुआ क्रमश: बारहों राशियों में से यात्रा करता है। यह प्राय: सदैव वर्षा तथा अन्य प्रभावों के रूप में प्रतिकूल अवस्थाएँ उत्पन्न करता है।
 
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All glories to saints and sages of the Supreme Lord
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥