श्रीमद् भागवतम
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भागवत पुराण  »  स्कन्ध 5: सृष्टि की प्रेरणा  »  अध्याय 22: ग्रहों की कक्ष्याएँ  »  श्लोक 15

 
श्लोक
तत उपरिष्टाद्विलक्षयोजनान्तरगता भगवान् बृहस्पतिरेकैकस्मिन् राशौ परिवत्सरं परिवत्सरं चरति यदि न वक्र: स्यात्प्रायेणानुकूलो ब्राह्मणकुलस्य ॥ १५ ॥
 
शब्दार्थ
तत:—वह (मंगल); उपरिष्टात्—ऊपर; द्वि-लक्ष-योजन-अन्तर-गता:—२,००,००० योजन अर्थात् १६,००,००० मील की दूरी पर स्थित; भगवान्—सर्वाधिक शक्तिमान ग्रह; बृहस्पति:—बृहस्पति; एक-एकस्मिन्—एक के पश्चात् एक; राशौ—राशि में; परिवत्सरम् परिवत्सरम्—प्रति परिवत्सर तक; चरति—चलता है; यदि—यदि; न—नहीं; वक्र:—वक्र; स्यात्—हो जाता है; प्रायेण—प्राय:; अनुकूल:—शुभ; ब्राह्मण-कुलस्य—इस ब्रह्माण्ड के ब्राह्मणों के लिए ।.
 
अनुवाद
 
 मंगल से १,६००,००० योजन अथवा पृथ्वी से १०,४००,००० मील ऊपर बृहस्पति नामक ग्रह स्थित है जो एक परिवत्सर में एक राशि की यात्रा करता है। यदि यह वक्रगति से न चले तो यह ब्राह्मणों के लिए अत्यन्त अनुकूल रहता है।
 
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All glories to saints and sages of the Supreme Lord
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥