श्रीमद् भागवतम
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भागवत पुराण  »  स्कन्ध 5: सृष्टि की प्रेरणा  »  अध्याय 23: शिशुमार ग्रह-मण्डल  »  श्लोक 2

 
श्लोक
स हि सर्वेषां ज्योतिर्गणानां ग्रहनक्षत्रादीनामनिमिषेणाव्यक्तरंहसा भगवता कालेन भ्राम्यमाणानां स्थाणुरिवावष्टम्भ ईश्वरेण विहित: शश्वदवभासते ॥ २ ॥
 
शब्दार्थ
स:—ध्रुव महाराज का वह लोक; हि—निस्सन्देह; सर्वेषाम्—सभी; ज्योति:-गणानाम्—ज्योतिर्गण; ग्रह-नक्षत्र-आदीनाम्—ग्रह नक्षत्र इत्यादि का; अनिमिषेण—न विश्राम लेने वाला; अव्यक्त—अवर्णनीय; रंहसा—जिसका बल; भगवता—सर्व शक्तिमान; कालेन—काल द्वारा; भ्राम्यमाणानाम्—घुमाया जाकर; स्थाणु: इव—ठूँठ की भाँति; अवष्टम्भ:—आधार-स्तम्भ; ईश्वरेण— श्रीभगवान् की इच्छा से; विहित:—स्थापित; शश्वत्—अनवरत; अवभासते—प्रकाशित होता रहता है ।.
 
अनुवाद
 
 श्रीभगवान् की परम इच्छा से स्थापित धुव्र महाराज का लोक ध्रुवलोक समस्त नक्षत्रों तथा ग्रहों के मध्यवर्ती-स्तम्भ के रूप में निरन्तर प्रकाशमान रहता है। सदा जागते रहने वाला अदृश्य सर्वशक्तिमान काल इन ज्योतिर्गणों को अहर्निश ध्रुवतारे के चारों ओर घुमाता रहता है।
 
तात्पर्य
 यहाँ पर यह स्पष्ट रूप से व्यक्त हुआ है कि सभी ज्योतिर्गण, नक्षत्र तथा ग्रह परम काल के प्रभाव से चक्कर लगाते रहते हैं। यह काल श्रीभगवान् की दूसरी विशेषता है। प्रत्येक प्राणी काल के वशीभूत है, किन्तु श्रीभगवान् इतने सदय हैं और अपने भक्त महाराज ध्रुव को इतना चाहते हैं कि उन्होंने समस्त ज्योतिर्पिण्डों को ध्रुवलोक
के अधीन कर रखा है और ऐसी व्यवस्था की है कि काल उनके अधीन अथवा उनके सहयोग से कार्य करता है। वास्तव में प्रत्येक कार्य पूर्ण पुरुषोत्तम भगवान् की इच्छा और निर्देश से चालित है, किन्तु अपने भक्त ध्रुव को सर्वाधिक महत्त्वपूर्ण प्राणी बनाने के उद्देश्य से ही काल के कार्यकलापों को भी उनके अधीन कर रखा है।
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All glories to saints and sages of the Supreme Lord
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥