श्रीमद् भागवतम
 
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भागवत पुराण  »  स्कन्ध 5: सृष्टि की प्रेरणा  »  अध्याय 23: शिशुमार ग्रह-मण्डल  »  श्लोक 4
 
 
श्लोक
केचनैतज्ज्योतिरनीकं शिशुमारसंस्थानेन भगवतो वासुदेवस्य योगधारणायामनुवर्णयन्ति ॥ ४ ॥
 
शब्दार्थ
केचन—कुछ योगी अथवा ज्योतिर्विद; एतत्—यह; ज्योति:-अनीकम्—नक्षत्रों तथा ग्रहों का विशाल चक्र; शिशुमार संस्थानेन—यह चक्र मानो शिशुमार (सूँस) हो; भगवत:—श्रीभगवान्; वासुदेवस्य—भगवान् वासुदेव, श्रीकृष्ण का; योग- धारणायाम्—ध्यानमग्न; अनुवर्णयन्ति—बताते हैं ।.
 
अनुवाद
 
 नक्षत्रों तथा ग्रहों से युक्त यह विराट यंत्र जल में शिशुमार (सूँस मछली) के स्वरूप से समानता रखने वाला है। कभी-कभी इसे वासुदेव श्रीकृष्ण का अवतार माना जाता है। वास्तव में दृश्य होने के कारण बड़े-बड़े योगी वासुदेव के इस रूप का ध्यान करते हैं।
 
तात्पर्य
 ऐसे योगी जिनके मन भगवान् के रूप को अपने में नहीं स्थान दे पाते वे किसी अत्यन्त विराटवस्तु की यथा विराटपुरुष की कल्पना करते हैं। इसलिए कुछ योगी इस काल्पनिक शिशुमार के आकाश में उसी तरह तैरते हुए रूप की कल्पना करते हैं जिस तरह जल में डॅल्फिन मछली तैरती है। ये इस पर परमेश्वर के विराट रूप की भाँति ध्यान करते हैं।
 
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हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥