श्रीमद् भागवतम
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भागवत पुराण  »  स्कन्ध 5: सृष्टि की प्रेरणा  »  अध्याय 23: शिशुमार ग्रह-मण्डल  »  श्लोक 5

 
श्लोक
यस्य पुच्छाग्रेऽवाक्‌शिरस: कुण्डलीभूतदेहस्य ध्रुव उपकल्पितस्तस्य लाङ्गूले प्रजापतिरग्निरिन्द्रो धर्म इति पुच्छमूले धाता विधाता च कट्यां सप्तर्षय: । तस्य दक्षिणावर्तकुण्डलीभूतशरीरस्य यान्युदगयनानि दक्षिणपार्श्वे तु नक्षत्राण्युपकल्पयन्ति दक्षिणायनानि तु सव्ये । यथा शिशुमारस्य कुण्डलाभोगसन्निवेशस्य पार्श्वयोरुभयोरप्यवयवा: समसंख्या भवन्ति । पृष्ठे त्वजवीथी आकाशगङ्गा चोदरत: ॥ ५ ॥
 
शब्दार्थ
यस्य—जिसके; पुच्छ-अग्रे—पूँछ के सिरे पर; अवाक्शिरस:—जिसका सिर नीचे की ओर है; कुण्डली-भूत-देहस्य—जिसका शरीर कुण्डलीबद्ध है; ध्रुव:—ध्रुव लोक के ध्रुव महाराज; उपकल्पित:—स्थित है; तस्य—उसकी; लाङ्गूले—पूँछ पर; प्रजापति:—प्रजापति; अग्नि:—अग्नि; इन्द्र:—इन्द्र; धर्म:—धर्म; इति—इस प्रकार; पुच्छ-मूले—पूँछ के मूल भाग पर; धाता विधाता—धाता तथा विधाता नामक देवतागण; च—भी; कट्याम्—कटि भाग पर; सप्त-ऋषय:—सप्तर्षिगण; तस्य—उसके; दक्षिण-आवर्त-कुण्डली-भूत-शरीरस्य—जिसका शरीर दक्षिण की ओर घूमती हुई कुण्डली के समान है; यानि—जो; उदगयनानि—उत्तरी पथ को बताने वाले; दक्षिण-पार्श्वे—दाहिनी ओर; तु—लेकिन; नक्षत्राणि—नक्षत्रगण; उपकल्पयन्ति— स्थित हैं; दक्षिण-आयनानि—पुष्या से लेकर उत्तराषाढ़ा तक के १४ नक्षत्र जो उत्तरापथ को बताते हैं; तु—लेकिन; सव्ये—बाईं ओर; यथा—जिस प्रकार; शिशुमारस्य—सूँस का; कुण्डला-भोग-सन्निवेशस्य—जिसका शरीर कुण्डली सदृश प्रतीत होता है; पार्श्वयो:—पार्श्वों में; उभयो:—दोनों; अपि—ही; अवयवा:—शरीर के अंग; समसङ्ख्या:—समान संख्या के (१४); भवन्ति— हैं; पृष्ठे—पीठ पर; तु—निस्सन्देह; अजवीथी—दक्षिण पथ को बताने वाले प्रथम तीन नक्षत्र (मूला, पूर्वाषाढ़ा तथा उत्तराषाढ़ा); आकाश-गङ्गा—आकाशगंगा; च—भी; उदरत:—पेट पर ।.
 
अनुवाद
 
 यह शिशुमार कुण्डली मारे हुए है और इसका सिर नीचे की ओर है। इसकी पूँछ के सिरे पर ध्रुव नामक लोक स्थित है। इसकी पूँछ के मध्य भाग में प्रजापति, अग्नि, इन्द्र तथा धर्म नामक देवताओं के लोक स्थित हैं और पूँछ के मूल भाग में धाता और विधाता नामक देवताओं के लोक हैं। उसके कटिप्रदेश में वसिष्ठ, अंगिरा इत्यादि सातों ऋषि हैं। कुण्डलीबद्ध शिशुमार का शरीर दाहिनी ओर मुड़ता है, जिसमें अभिजित् से लेकर पुनर्वसु पर्यन्त चौदह नक्षत्र स्थित हैं। इसकी बाईं ओर पुष्य से लेकर उत्तराषाढ़ा पर्यन्त चौदह नक्षत्र हैं। इस प्रकार दोनों ओर समान संख्या में नक्षत्र होने से इसका शरीर सन्तुलित है। शिशुमार के पृष्ठ भाग में अजवीथी नामक नक्षत्रों का समूह है और उदर में आकाश-गंगा है।
 
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All glories to saints and sages of the Supreme Lord
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥