श्रीमद् भागवतम
 
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भागवत पुराण  »  स्कन्ध 5: सृष्टि की प्रेरणा  »  अध्याय 23: शिशुमार ग्रह-मण्डल  »  श्लोक 6
 
 
श्लोक
पुनर्वसुपुष्यौ दक्षिणवामयो: श्रोण्योरार्द्राश्लेषे च दक्षिणवामयो: पश्चिमयो: पादयोरभिजिदुत्तराषाढे दक्षिणवामयोर्नासिकयोर्यथासङ्ख्यं श्रवणपूर्वाषाढे दक्षिणवामयोर्लोचनयोर्धनिष्ठा मूलं च दक्षिणवामयो: कर्णयोर्मघादीन्यष्ट नक्षत्राणि दक्षिणायनानि वामपार्श्ववङ्‌क्रिषु युञ्जीत तथैव मृगशीर्षादीन्युदगयनानि दक्षिणपार्श्ववङ्‌क्रिषु प्रातिलोम्येन प्रयुञ्जीत शतभिषाज्येष्ठे स्कन्धयोर्दक्षिणवामयोर्न्यसेत् ॥ ६ ॥
 
शब्दार्थ
पुनर्वसु—पुनर्वसु नामक नक्षत्र; पुष्यौ—तथा पुष्य नक्षत्र; दक्षिण-वामयो:—दाहिने तथा बाएँ; श्रोण्यो:—कटि तट; आर्द्रा— आर्द्रा नामक नक्षत्र; अश्लेषे—अश्लेषा नक्षत्र; च—भी; दक्षिण-वामयो:—दाएँ तथा बाएँ; पश्चिमयो:—पीछे; पादयो:—पैर; अभिजित्-उत्तराषाढे—अभिजित् तथा उत्तराषाढ़ा नक्षत्र; दक्षिण-वामयो:—दाएँ तथा बाएँ; नासिकयो:—नथुने; यथा सङ्ख्यम्—क्रमानुसार; श्रवण-पूर्वाषाढे—श्रवणा तथा पूर्वाषाढ़ा नामक नक्षत्र; दक्षिण-वामयो:—दाईं तथा बाईं ओर; लोचनयो:—आँखें; धनिष्ठा मूलम् च—तथा धनिष्ठा एवं मूला नक्षत्र; दक्षिण-वामयो:—दाएँ बाएँ; कर्णयो:—कान; मघा- आदीनि—मघा आदि नक्षत्र; अष्ट नक्षत्राणि—आठ नक्षत्र; दक्षिण-आयनानि—दक्षिण पथ को बताने वाले; वाम-पार्श्व—बाईं ओर; वङ्क्रिषु—पसलियों पर; युञ्जीत—रख सकते हैं; तथा एव—इसी प्रकार; मृग-शीर्षा-आदीनि—मृगशीर्ष आदि; उदगयनानि—उत्तरी पथ को बताते हुए; दक्षिण-पार्श्व-वङ्क्रिषु—दाहिनी ओर; प्रातिलोम्येन—विपरीत क्रम में; प्रयुञ्जीत—रख सकते हैं; शतभिषा—शतभिषा; ज्येष्ठे—ज्येष्ठा; स्कन्धयो:—दोनों कन्धों पर; दक्षिण-वामयो:—दाएँ तथा बाएँ; न्यसेत्—रखना चाहिए ।.
 
अनुवाद
 
 शिशुमार चक्र के दाहिने तथा बाएँ कटि तटों पर पुनर्वसु तथा पुष्य नक्षत्र हैं। इसके दाएँ तथा बाएँ पैरों पर आर्द्रा एवं अश्लेषा; इसके दाएँ तथा बाएँ नथुनों पर क्रमश: अभिजित् तथा उत्तराषाढ़ा; इसके दाएँ तथा बाएँ नेत्रों पर श्रवणा तथा पूर्वषाढ़ा और इसके दाएँ तथा बाएँ कानों पर धनिष्ठा तथा मूला स्थित हैं। मघा से अनुराधा तक दक्षिणायन् के आठ नक्षत्र बाईं पसलियों पर और उत्तरायण के मृगशीर्ष से पूर्वभाद्र पर्यन्त आठ नक्षत्र दाईं ओर की पसलियों पर स्थित हैं। शतभिषा तथा ज्येष्ठा ये दो नक्षत्र क्रमश: दाहिने और बाएँ कन्धों पर स्थित हैं।
 
 
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हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥