श्रीमद् भागवतम
 
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भागवत पुराण  »  स्कन्ध 5: सृष्टि की प्रेरणा  »  अध्याय 23: शिशुमार ग्रह-मण्डल  »  श्लोक 9
 
 
श्लोक
ग्रहर्क्षतारामयमाधिदैविकं
पापापहं मन्त्रकृतां त्रिकालम् ।
नमस्यत: स्मरतो वा त्रिकालं
नश्येत तत्कालजमाशु पापम् ॥ ९ ॥
 
शब्दार्थ
ग्रह-ऋक्ष-तारा-मयम्—समस्त नक्षत्रों तथा ग्रहों से युक्त; आधिदैविकम्—समस्त देवताओं के अधिपति; पाप-अपहम्—पापों का नाश करने वाले; मन्त्र-कृताम्—जो उपर्युक्त मंत्र का जप करते हैं; त्रि-कालम्—तीनों काल को; नमस्यत:—नमस्कार; स्मरत:—ध्यान करते हैं; वा—अथवा; त्रि-कालम्—तीन बार; नश्येत—नाश करता है; तत्-काल-जम्—उस समय उत्पन्न; आशु—शीघ्रता से; पापम्—समस्त पापों को ।.
 
अनुवाद
 
 शिशुमार चक्र रूपी परमेश्वर विष्णु का शरीर समस्त देवताओं, नक्षत्रों तथा ग्रहों का आश्रय है। जो व्यक्ति परम पुरुष की आराधना करने हेतु नित्य तीन बार प्रात:, दोपहर तथा सायंकाल इस मन्त्र का जप करता है, वह समस्त पापों के फल से अवश्य ही मुक्त हो जाता है। यदि कोई इस रूप में उनको केवल नमस्कार करे या इसे दिन में तीन बार स्मरण करे तो उसके हाल में किए हुए समस्त पाप नष्ट हो जाते हैं।
 
तात्पर्य
 ब्रह्माण्ड के ग्रहों के सम्पूर्ण विवरण का सार-समाहार करते हुए श्रील विश्वनाथ चक्रवर्ती ठाकुर कहते हैं कि जो कोई इस विराट रूप या विश्वरूप का ध्यान करने में समर्थ है और दिन में उनका तीन बार स्मरण करता है, वह समस्त पाप-फलों से मुक्त हो जाता है। उनका अनुमान है कि ध्रुवलोक सूर्य से ३८,००,००० योजन ऊपर स्थित है। ध्रुवलोक से भी १,००,००,००० योजन ऊपर महर्लोक और इससे २,००,००,००० योजन ऊपर जनलोक, फिर इससे ८,००,००,००० योजन ऊपर तपोलोक और इससे भी १२,००,००,००० योजन ऊपर सत्यलोक स्थित है। इस प्रकार सूर्य से सत्यलोक की दूरी २३,३८,००,००० योजन अथवा १,८७,०४,००,००० मील है। सत्यलोक से २,६२,००,००० योजन ऊपर वैकुण्ठलोक प्रारम्भ होते हैं। विष्णु पुराण के अनुसार सूर्य से ब्रह्माण्ड का आवरण २६,००,००,००० योजन (२,०८,००,००,००० मील) दूर है। सूर्य से पृथ्वी तक की दूरी १,००,००० योजन है और पृथ्वी के नीचे ७०,००० योजन दूरी पर सात निम्नलोक हैं, जिनके नाम हैं—अतल, वितल, सुतल, तलातल, महातल, रसातल तथा पाताल। इन लोकों से ३०,००० योजन नीचे गर्भोदक सागर में शेषनाग शयन कर रहे हैं। यह सागर २४,९८,००,००० योजन गहरा है। इस प्रकार ब्रह्माण्ड का समग्र व्यास लगभग ५०,००,००,००० योजन या ४,००,००,००,००० मील है।
 
इस प्रकार श्रीमद्भागवत के पंचम स्कन्ध के अन्तर्गत शिशुमार ग्रहमण्डल” नामक तेईसवें अध्याय के भक्तिवेदान्त तात्पर्य पूर्ण हुए।
 
 
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