श्रीमद् भागवतम
 
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भागवत पुराण  »  स्कन्ध 5: सृष्टि की प्रेरणा  »  अध्याय 24: नीचे के स्वर्गीय लोकों का वर्णन  »  श्लोक 17
 
 
श्लोक
ततोऽधस्ताद्वितले हरो भगवान् हाटकेश्वर: स्वपार्षदभूतगणावृत: प्रजापतिसर्गोपबृंहणाय भवो भवान्या सह मिथुनीभूत आस्ते यत: प्रवृत्ता सरित्प्रवरा हाटकी नाम भवयोर्वीर्येण यत्र चित्रभानुर्मातरिश्वना समिध्यमान ओजसा पिबति तन्निष्ठ्यूतं हाटकाख्यं सुवर्णं भूषणेनासुरेन्द्रावरोधेषु पुरुषा: सह पुरुषीभिर्धारयन्ति ॥ १७ ॥
 
शब्दार्थ
तत:—अतललोक के; अधस्तात्—नीचे; वितले—वितललोक में; हर:—भगवान् शिव; भगवान्—सर्वशक्तिमान; हाटकेश्वर:—स्वर्ण का स्वामी; स्व-पार्षद—अपने पार्षदों से; भूत-गण—जो भूत जैसे प्राणी हैं; आवृत:—घिर कर; प्रजापति सर्ग—भगवान् ब्रह्मा की सृष्टि; उपबृंहणाय—जनसंख्या बढ़ाने के उद्देश्य से; भव:—भगवान् शिव; भवान्या सह—अपनी पत्नी भवानी सहित; मिथुनी-भूत:—कामक्रीड़ा में रत; आस्ते—रहते हैं; यत:—उस लोक (वितल) से; प्रवृत्ता—निकल कर; सरित्-प्रवरा—बड़ी नदी; हाटकी—हाटकी; नाम—नाम की; भवयो: वीर्येण—भगवान् शिव तथा भवानी के वीर्य एवं रज से; यत्र—जहाँ; चित्र-भानु:—अग्निदेवता; मातरिश्वना—वायु द्वारा; समिध्यमान:—तेजी से प्रज्ज्वलित किये जाने पर; ओजसा— अत्यधिक शक्ति के साथ; पिबति—पीता है; तत्—वह; निष्ठ्यूतम्—फूत्कार करते हुए थूकना; हाटक-आख्यम्—हाटक नाम का; सुवर्णम्—सोना; भूषणेन—अनेक प्रकार के आभूषणों द्वारा; असुर-इन्द्र—महान् असुरों के; अवरोधेषु—घरों में; पुरुषा:—नर; सह—के साथ; पुरुषीभि:—अपनी पत्नियों तथा स्त्रियों के; धारयन्ति—धारण करते हैं ।.
 
अनुवाद
 
 अतललोक के नीचे अगला ग्रह वितल है जहाँ स्वर्ण खानों के स्वामी भगवान् शिव अपने गणों, भूतों तथा ऐसे ही अन्य जीवों के साथ रहते हैं। पिता-रूप शिव माता-रूप भवानी के साथ विहार करते हैं और इनके वीर्य-रज के मिश्रण से हाटकी नामक नदी निकलती है। जब वायु द्वारा अग्नि प्रज्ज्वलित हो उठती है, तो वह नदी को पी जाती है और बाहर थूक देने पर हाटक नामक स्वर्ण उत्पन्न होता है। इस लोक के वासी असुर अपनी पत्नियों सहित उस स्वर्ण के बने आभूषणों से अपने को अलंकृत करते हैं और इस प्रकार से वे अत्यन्त सुखपूर्वक रहते हैं।
 
तात्पर्य
 ऐसा प्रतीत होता है कि भव तथा भवानी अर्थात् शिवजी तथा उनकी पत्नी के सम्भोग करने पर जो वीर्य निकलता है, उसमें जो रसायन होता है उसे अग्नि में तपाने पर सोना उत्पन्न किया जा सकता है। कहा जाता है कि मध्य युग के कीमयागर निम्न धातु से सोना बनाना जानते थे और श्रील सनातन गोस्वामी का भी कथन है काँसे को पारे से अभिकृत करने पर सोना बन सकता है। श्रील सनातन गोस्वामी का यह उल्लेख निम्न वर्ग के पुरुषों को ब्राह्मण बनाने के प्रसंग में हुआ है। उनका कथन है—

यथा कांचनतां याति कांस्यं रसं विधानत:।

तथा दीक्षाविधानेन द्विजत्वम् जायते नृणाम् ॥

“जिस प्रकार कांसे को पारे से अभिकृत करके उसे सोने में बदला जा सकता है उसी प्रकार निम्न कुल में उत्पन्न मनुष्य को वैष्णव कार्यों में लगाकर ब्राह्मण बनाया जा सकता है।” अन्तर्राष्ट्रीय कृष्णभावनामृत संघ द्वारा म्लेच्छों तथा यवनों को उचित ढंग से दीक्षा दे कर तथा उन्हें मांसाहार, मादक द्रव्य, व्यभिचार तथा द्यूत-क्रीड़ा से विरत करके ब्राह्मणों में परिणत करने का प्रयास किया जा रहा है। जो कोई इन चार पापकर्मों का परित्याग करके हरे कृष्ण महामंत्र का जप करता है, वह प्रामाणिक दीक्षा द्वारा शुद्ध ब्राह्मण बन सकता है। ऐसा श्रील सनातन गोस्वामी का प्रस्ताव है।

इसके अतिरिक्त, यदि कोई इस श्लोक से संकेत पाकर यह सीख ले कि कांसे के साथ पारे को कैसे मिलाते तथा गलाते हैं, तो वह सस्ते में सोना तैयार कर सकता है। यद्यपि मध्ययुग के कीमियागरों ने स्वर्ण बनाने का प्रयास किया, किन्तु वे असफल रहे, क्योंकि शायद उन्होंने सही निर्देशों का पालन नहीं किया।

 
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हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥